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% - Shrimad Bhagwat Geeta

।। Shrimadbhagwad Geeta ।। A Practical Approach  ।।

।। श्रीमद्भगवत  गीता ।। एक व्यवहारिक सोच ।।

।। Chapter  06.32 I

।। अध्याय    06.32  ।।

॥ श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ॥ 6.32

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥

“ātmaupamyena sarvatra,

samaḿ paśyati yo ‘rjuna..।

sukhaḿ vā yadi vā duḥkhaḿ,

sa yogī paramo mataḥ”..।।

भावार्थ: 

हे अर्जुन! योग में स्थित जो मनुष्य अपने ही समान सभी प्राणीयों को देखता है, सभी प्राणीयों के सुख और दुःख को भी एक समान रूप से देखता है, उसी को परम पूर्ण-योगी समझना चाहिये। (३२)

Meaning:

By comparing himself to everything, one who sees the same, O Arjuna, whether in joy or in sorrow, such a yogi is considered supreme.

Explanation:

In this shloka, Shri Krishna concludes his discourse on the topic of meditation. He also summarizes the entire topic of meditation. He says that one who sees himself in others, and thus experiences their joys and sorrows, becomes a yogi or meditator of the highest caliber.

This is a simple, straightforward and practical teaching that is central tenet of most religions: “do unto others as you would have them do unto you.” Shri Krishna echoes that golden rule in this shloka. He says that the perfected meditator sees no difference between himself and other beings, just like we do not see differences between our left and right hand, or other parts of the body.

We consider all the limbs of our body as ours and are equally concerned if any of them is damaged. We are incontrovertible in the conviction that the harm done to any of our limbs is harm done to ourselves. Similarly, those who see God in all beings consider the joys and sorrows of others as their own. Therefore, such yogis are always the well-wishers of all souls and they strive for the eternal benefit of all. This is the sama-darśhana (equality of vision) of perfected yogis.

If the meditator sees no difference between himself and other beings, then any negative emotions such as jealousy, hatred, greed and anger go away. When one cannot get angry at one’s right hand or left leg, how one get angry with anyone or anything if all are part of the same “being”? In other words, the meditator “puts himself in the other person’s shoes”. He experiences joy when others are happy. He experiences sorrow when others feel sad.

Moreover, one who obtains such a vision will never hurt anyone else physically, mentally or verbally. Such an attitude of non-violence or ahimsa comes naturally to a meditator, since meditation is next to impossible for a person that harbours any kind of hatred or negative emotion towards anyone.

So here Krishna says a jñāni’s mind expands to such an extent; that he identifies with all the bodies as his own body; previously he was identified with one body only; now he knows I am the ātma, not only behind this body, I am the  very ātma behind all the bodies. And therefore all the bodies becomes like my bodies, my hands, and my legs. And because of this universal identification; Krishna says a jñāni cannot hurt anyone; because hurting any living being is as though hurting himself; because of universal identification. Previously I could comfortably hurt anyone; whom? my own body; but now it is not possible. Therefore jñāni becomes an embodiment of compassion; an embodiment of sympathy; an embodiment of ahimsa; because if anyone feels pain, he also is capable of sensing the pain of everyone; he has that empathy by which he intensely appreciates the pain of everyone; and therefore he cannot pain anyone; he cannot cause pain to anyone; and if there is pain to anyone; then immediately and automatically, he goes to his rescue.

With this shloka, Shri Krishna concludes the topic of meditation. But the chapter is not over yet. In the next shloka, Arjuna raises a doubt that many of us would agree with.

।। हिंदी समीक्षा ।।

जिस को इसी अध्याय के सत्ताईसवें श्लोक से ब्रह्मभूत, अर्थात जिस ने अपने अंदर मन को स्थिर कर लिया है, से ले कर आत्मा से परमात्मा को पहचाना एवम परमात्मा को सभी जीव एवम पदार्थो में देखना था, सांसारिक सुखों की अपेक्षा आत्यंतिक सुख को प्राप्त करना हम ने पढ़ा। अब योगी पुरुष का व्यवहार को इस श्लोक में बताया गया है।

तत्त्वज्ञान और आत्मानुभव में स्थित योगीजन स्वभावत: सर्वत्र व्याप्त आत्मा के दर्शन करते हैं। वे सभी कर्मों में आत्मा के वैभव को देखते हैं और जानते हैं कि उपाधियों के द्वारा किये जाने वाले समस्त कर्म आत्मकृपा से ही होते हैं। बाह्य स्थूल और आन्तरिक सूक्ष्म जगत् आत्मा की ही अभिव्यक्ति है। गीता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो अन्य के सुख एवं दुख को इस प्रकार समझता है जैसे वे उस के अपने ही हों। प्रसिद्ध नैतिक नियम है कि अन्य के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा कि उस से तुम अपेक्षा रखते हो। परन्तु यह नियम सामान्य मनुष्य को अप्रिय लगता है क्योंकि स्वार्थ के कारण वह सोचता है कि क्यों वह दूसरों को अपने ही समान समझे। अज्ञान तथा स्वार्थ के कारण लोगों की स्वाभाविक प्रवृत्ति अनैतिकता की ओर झुक जाती है। पूर्व श्लोकों में इस का स्पष्टीकरण किया गया है कि क्यों हमें प्राणीमात्र से प्रेम करना चाहिए। योगी आत्मसाक्षात्कार के द्वारा समस्त सृष्टि को आत्मा की ही अभिव्यक्ति के रूप में पहचानता है अत सबसे प्रेम होना स्वाभाविक ही है।  इसी प्रकार आत्मा को पहचान लेने पर सम्पूर्ण नामरूप की सृष्टि आत्मस्वरूप ही बन जाती है और समस्त कालों में सर्वत्र केवल मैं (आत्मा) ही व्याप्त रहता हूँ। आत्मैकत्व दर्शन करने वाला सिद्ध व्यक्ति ही गीता में परम योगी माना गया है जो समाज को देता अधिक है और लेता कम है। प्रेम उस का श्वास है और करुणा उस की जीविका। प्रेम की जीवन की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति के मोह, लोभ, राग द्वेष, घृणा, वैर जैसे समस्त दुर्गुणों से किसी व्यक्ति की मुक्त करती है।

सनातन धर्म के प्रति राजनैतिक और स्वार्थ में कुछ लोगो ने यह भ्रम फैला रखा है कि यह धर्म व्यक्तिगत मोक्ष और स्वतंत्रता की बात करता है और अन्य के प्रति स्वार्थ के अंतर्गत उदासीन रहने को कहता है। किंतु यह गलत धारणा का यही अंत है कि ध्यान योग की पराकाष्ठा ही तभी पूर्ण होती है, जब योगी अपने दुख से अधिक जन कल्याण और अन्य के दुख को न केवल समझता है, वरन उसे दूर भी करने का प्रयास करता है। उस के अंदर अपने पराए का भेद नहीं होता और वह सभी के हृदय में परमात्मा को निवास करते हुए, अपने समान  ही समझता है। सनातन धर्म का परिचय इस श्लोक से दिया जा सकता है।

अयं निजःपरोवेति गणना लघुचेतसाम् उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम्।। अर्थात् – यह मेरा है, यह पराया है ऐसी गणना दुष्टों की (छोटे चित्त वालों की) होती है। जब कि उदार चित्त वाले (बड़े दिल वाले) तो पूरे विश्व को ही अपना परिवार मानते हैं। आज का भारत इसी दर्शन में आगे भी बढ़ रहा है।

शरीर में आसक्त अज्ञानी पुरुष के शरीर में पीड़ा होने पर उस पीड़ा को दूर करने में और सुख पहुँचाने में उस की जैसी चेष्टा होती है तत्परता होती है ऐसे ही दूसरों का दुःख दूर करने में और सुख पहुँचाने में ज्ञानी महात्माओं की स्वाभाविक चेष्टा होती है,  तत्परता होती है।

उन के मन में यह अभिमान नहीं आता कि मैं प्राणियों का दुःख दूर कर रहा हूँ दूसरों को सुख पहुँचा रहा हूँ। उन का दुःख दूर करने की चेष्टा करने पर वे अपने में कोई विशेषता भी नहीं देखते। उन का स्वभाव ही दूसरों का दुःख दूर करने का उन को सुख पहुँचाने का होता है। ज्ञानी पुरुष के शरीर में पीड़ा होती है तो वह उस को सह सकता है और उस के द्वारा उस पीड़ा की उपेक्षा भी हो सकती है परन्तु दूसरे के शरीर में पीड़ा हो तो उस को वह सह नहीं सकता।जैसे इन्द्र ने बिना किसी अपराध के दधीचि ऋषि का सिर काट दिया। पीछे अश्विनी कुमारों ने उन को पुनः जीवन दिया। परन्तु जब इन्द्र का काम पड़ा तब दधीचि ने अपना शरीर छोड़ कर उन को (वज्र बनाने के लिये) अपनी हड्डियाँ दे दीं यहाँ यह शंका हो सकती है कि अपने शरीर के दुःख की तो उपेक्षा होती है और दूसरों के दुःख की उपेक्षा नहीं होती यह तो विषमता हो गयी यह समता कहाँ रही इस का समाधान है कि वास्तव में यह विषमता समता की जनक है समता को प्राप्त कराने वाली है। यह विषमता समता से भी ऊँचे दर्जे की चीज है। साधक साधनअवस्था में ऐसी विषमता करता है तो सिद्धअवस्था में भी उस की ऐसी ही स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। परन्तु उसके अन्तःकरण में किञ्चिन्मात्र भी विषमता नहीं आती।

सनातन जैसी विषमता मनुस्मृति के विषय में भी है। अधिकतर विरोध करने वाले स्वार्थ, द्वेष और क्षुद्र राजनीति में मनुस्मृति को बिना पढ़े और समझे कुछ भी वक्तव्य दे देते है और उन के लालच में फसे भक्त उसे सच मान लेते है। पत्रकारिता में निडर और सत्य का दंभ भरने वाले आज की तारीख में सब से अधिक बिकाऊ मीडिया उसे गलत तरीके से प्रस्तुत भी करती है। मनु स्मृति 12.91 में लिखा है कि सब में आत्मा है, आत्मा में सब है। तो आत्मा अबाध्य है और सब बाध्य है। इसलिए आत्मा नही है, यह अनुभव किसी को कभी भी नही हो सकता,  किन्तु दुनियां नहीं है, यह अनुभव किसी को हो सकता है। इस का अर्थ यही समझा जाए कि आत्मा सत्य है और बाकी सब मिथ्या है।

ऐसी दृष्टि प्राप्त कर के जो शेष  सभी का यजन अर्थात बलि अर्थात समस्त कामनाओं और आसक्ति, अहम एवम देह के मोह का त्याग कर देता है, वह अपने अद्वितीय स्वरूप में स्थित हो जाता है, उसे स्वराज्य अर्थात स्वतंत्रता प्राप्त हो जाती है।

समता में हम सब को अपना भाई समझो यह भ्रातृभाव बड़ा उत्तम है, बताया जाता है । परन्तु स्वार्थ भाव को ले कर जब भाई भाई लड़ते हैं तब भ्रातृ भाव नहीं रहता प्रत्युत वैर भाव पैदा हो जाता है। जैसे कौरवों और पाण्डवों में लड़ाई हो गयी। इसी प्रकार समता को शरीर भाव के समान भी बताया है क्योंकि शरीर भाव में कभी वैर नहीं हो सकता। जैसे अपने दाँतों से अपनी जीभ अथवा होठ कट जाय तो दाँतों को कोई नहीं तोड़ता अर्थत् दाँतों के साथ कोई वैर नहीं करता। ऐसे ही अपने शरीर की उपमा से जो सब में सुखदुःख को समान देखता है उस में कभी वैर भाव नहीं होता। इस शरीर भाव से भी ऊँचा है भगवद्भाव। इस भाव में अपने इष्टदेव का भाव होता है। तात्पर्य है कि भगवद्भाव भ्रातृ भाव और शरीर भाव से भी ऊँचा है। ध्यान योग को समाप्त करते हुए कृष्ण का यह आखिरी श्लोक है।

श्रीकृष्ण द्वारा ज्ञानी पुरुष का जो उपर्युक्त वर्णन शब्दचित्र के माध्यम से किया गया है वह किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है किन्तु व्यावहारिक बुद्धि का अर्जुन उक्त लक्ष्य को पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है और वह प्रश्न के रूप में अपनी शंका को व्यक्त करता है। यथोक्त सम्यग्दर्शन रूप योग का संपादन दुष्कर जान कर उस की प्राप्ति का निश्चयात्मक उपाय जानने की इच्छा से अर्जुन क्या जानना चाहता है उसे हम आगे पढेंगे।

।। हरि ॐ तत सत ।। 6.32।।

Complied by: CA R K Ganeriwala ( +91 9422310075)

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