।। Shrimadbhagwad Geeta ।। A Practical Approach ।।
।। श्रीमद्भगवत गीता ।। एक व्यवहारिक सोच ।।
।। Chapter 06.32 ।I Additional II
।। अध्याय 06.32 ।। विशेष II
।। विचारणीय बात – गीता अध्ययन और हम ।।विशेष -6.32 ।।
समस्त प्राणी मात्र की रचना का आधार आत्मा और प्रकृति माना गया है और आत्मा परब्रह्म का ही अंश है। जीवन का उद्देश्य मोक्ष माना गया है। यह दृष्टि कर्मयोगी, सांख्य योगी, ध्यानयोगी और भक्ति योगी सभी के लिये कही गई है। किंतु सांख्य, ध्यान, भक्ति सभी मे कर्मो को त्याज्य कहा गया है। अतः व्यवहार एवम नित सांसारिक क्रियाओं में इस को पूर्ण व्यवहारिकता में लाना सरल नही है। इसलिये गीता के माध्यम से जनसदाहरण के लिये महृषि व्यास जी भगवान श्री कृष्ण के माध्यम से कर्मयोग का मार्ग प्रतिपादित किया।
ज्ञानी के सामने प्रारब्ध के अनुसार अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति तो आती हैं, पर वह उस का भोग नहीं करता अर्थात् सुखी या दुःखी नहीं होता । यदि वह प्रारब्ध का भोग करे तो फिर ज्ञानी और अज्ञानी में क्या फर्क हुआ ? सुख-दुःख अन्तःकरण तक पहुँचते हैं, उस से आगे स्वरूप तक नहीं पहुँचते । प्रकृति से अतीत तत्त्व तक सुख-दुःख कैसे पहुँचेंगे ? गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य को कर्म का अधिकार है, इसलिये वह उसे निष्काम भाव से कर्ता है तो प्रारब्ध और संचित कर्मों के फल क्षीण हो कर नष्ट हो जाते है और नए कर्मों के फल भी नही संचित होते। प्रारब्ध और संचित मनुष्य को उस के पूर्व के कर्म का फल देते है किंतु उस को कर्म के बाध्य नही कर सकते। संसार मे समस्त क्रियाए प्रकृति करती है, वह निमित्त रहता है। इसलिये प्रकृति की क्रियाओं से वह कैसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है, वही निष्काम या आसक्ति से भरा हो सकता है।
यदि काम-क्रोधादि विकारों में फर्क न पड़े तो समझें कि अभी साधन हाथ नहीं लगा है । असली साधन हाथ लग जाय तो बहुत शीघ्र उन्नति होती है।
इसलिए मनु स्मृति कहती है कि मनुष्य की वाणी की शुद्धि माने वाणी से उपलक्षित समस्त कर्मेंद्रियों की शुद्धि ।मन की शुद्धि माने संपूर्ण ज्ञानेद्रियों की शुद्धि । आंख शुद्ध शुद्ध देखे, कान शुद्ध शुद्ध श्रवण करे, रसना शुद्ध शुद्ध भोजन करे। इस प्रकार कर्मेंद्रियां भी शुद्ध और ज्ञानेद्रियां भी शुद्ध हो। कोई भी विषय, किसी भी ओर से आ कर चोट न पहुंचा सके, वह अपने स्वरूप में गुप्त रहे। किसी भी व्यक्ति के जीवन में इस से अच्छा कोई उपाय या व्यवहारिक ज्ञान नही हो सकता। फिर यदि संसार में अशुद्ध भी हो तो अपना प्रयास शुद्धता की ओर ही रहेगा।
वेदांत एक ओर बात कहता है जिसे अर्धजरतीय न्याय कहते है। जैसे कृष्ण भगवान में कई लोग उन्हे लेडी किलर या स्त्रियों के पीछे भागने वाला समझते है। उन का तर्क यही है कि उन्होंने रास लीला रचाई, गोपियों को छेड़ा। किंतु वे इस बात को भूल जाते है कि भगवान कृष्ण ने 11 वर्ष की आयु में वृंदावन ही छोड़ दिया था, रास लीला 9 वर्ष की आयु में रचाई और वाकी सभी लीलाएं शिशुपन से 11 वर्ष में की। अब जिस का गांव में बचपन गुजरता है, वहां यह सब सहज और शुद्ध होता है। किंतु अशुद्धता मन में बैठी हो तो जो भी देखते, सुनते या करते है, वह मन की अशुद्धता के कारण अशुद्ध ही हो जाता है। हमारे ही अंदर ही अंतर्विरोध होने से हमारी आसक्ति परिच्छिन्न हो जाती है। हम पाना कुछ और चाहते है और देखना कुछ और। जैसे पाना हमे धन, पद या साथी है और देखना भगवान को चाहते है। यानि आधी मुर्गी पका कर खा जाए और आधी मुर्गी अंडा देती रहे। ऐसा कभी नही होता। जीवन में एक रुपता अर्थात निर्द्वंदता होना भी आवश्यक है।
इसी प्रकार कर्मयोग में जिस कामना और आसक्ति की त्याग कर निष्काम कर्म करने की बात कही गई है, उस में संशय रहता है कि कहीं इस से मेरी सांसारिक इच्छाओं का गला तो नही घुट जाएगा। संशय और संसार के सुख का मोह दोनो बने भी रहे और मुक्ति भी मिल जाए। हम किसी सभा में जाए तो लोग हमे पहचाने, हमारा सत्कार या सम्मान भी करे और हम निस्वार्थ और निष्काम भी बने रहे। मुक्ति के लिए संसार तो त्याग दिया किंतु आश्रम, शिष्य और भक्तो से जुड़ गए। पुस्तके गीता, वेदों और अध्यात्म की लिखी किंतु कॉपी राइट से आय भी चाहिए। हमारा आध्यात्मिक ज्ञान यदि ऊंचा हो गया और हम इसे सुनाने लायक हो गए, तो प्रवचन देने के लिए आने की फीस भी ऊंची चाहिए। अर्थात मुक्ति ही और संसार भी। यह कर्मयोग नही, भोग है।
अक्सर गीता शुद्ध हिंदी में आध्यात्मिक शब्दो से साथ आप को प्रस्तुत करने से कभी कभी या फिर हर बार सन्यासियों या योगियों के ज्ञान लगता है। किंतु जिस किसी ने राम या कृष्ण का जीवन चरित्र पढा है, वे ही समझ सकते है कि ज्ञान युक्त कर्म योगी किसे कहा सकते है। राम एवम कृष्ण दोनों ही सन्यासी नही थे, कृष्ण जो गीता सुना रहे है वो स्वयं द्वारकाधीश है। गीता को अपनाने वाले विश्व के अनेक कर्मयोगी बाल गंगाधर तिलक, dr राधाकृष्णन मेनन, गांधी जी एवम अनेक विश्व की हस्तियां है। गीता की मान्यता एक धार्मिक ग्रन्थ बना कर रोजाना पाठ करने की प्रेरणा देने से कुछ लाभ नही होता जब तक गीता में बताये चरित्र को अंतर्मन से नही अपनाया जाता। अक्सर कुएं में बैठे मेढ़क को समुन्द्र समझाना और अंधे को रंग के बारे में बताना कठिन होता है इसलिये एक कुआ ही विशाल एवम पूरा संसार दिखता है और दूसरा रंग को कभी नहीं जान सकता।
राम चरित मानस में भी, मर्यादा में जीवन जीने वाले राम ने मोह माया से ग्रसित रावण को समाप्त किया। यही समत्व है जो राम और रावण के प्रतीक के तौर पर आप के अंदर है और आप को स्वयं को प्राप्त करने के लिये असंभव से दिखने वाले रावण को समाप्त करना है जो ज्ञानी भी है, शक्ति शाली भी है। राम शांत, धैर्य, सयम एवम दृढ़ निश्चय वाले है जो असंभव से दिखनेवाले लक्ष्य को पूरा करते है। असत्य पर सत्य की विजय को हम दशहरा पर्व हम सब कितने सार्थक तरीके से हर साल मनाते है, इस को कोई इनकार नही कर सकता कि यह एक उत्सव मात्र है, कोई परिवर्तन नही। वास्तविक परिवर्तन गीता से तभी हो सकता है जब व्यक्ति निजी स्वार्थ, कामना और आसक्ति से ऊपर हो, दैवीय और असुर वृति के लोगो के भेद को समझे। सेना रावण के पास भी थी, प्रजा उस के राज में भी रहती थी जिसे अपने रोज के रहने, खाने, निज के परिवार के अतिरिक्त कोई दुख नही था। असुर वृति से जुड़े लोग रावण या दुर्योधन की सेना बनाते है किंतु दैवीय वृति से जुड़े लोग राम की सेना बनाते है।
बात कटु अवश्य है किंतु सत्य भी। हम अपने पूर्वाग्रह में ग्रसित है। अर्जुन की भांति। वेद व्यास जी ने अर्जुन के माध्यम से हजारों साल पहले यह ज्ञान पूर्वाग्रह से ग्रसित मनुष्य को सामने रख कर प्रश्नोत्तर द्वारा श्री कृष्ण के श्री मुख से लिखा, जो चिर सत्य है। पूर्वाग्रह नही छोड़ने वालो के लिए भी गीता है अंत मे यही कहा गया है कि मुझे जो बताना था बता दिया, अब अर्जुन तुम ही तय करो कि युद्ध करना है कि पलायन। गीता पढ़ने वाले प्रत्येक अध्ययनकर्ता पर यही बात लागू होती है कि अध्ययन के पूर्व और बाद में यदि कर्मों की आसक्ति और कामना में कोई अंतर नही है तो अध्ययन का ज्ञान, रावण या दुर्योधन के समान नुकसान दायक है। ज्ञान का व्यवसायिक करण और अनुभवहीन लोगो द्वारा उस पर टिप्पणी इस का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
वेद व्यास जी ने गीता के ज्ञान को सार्वजनिक नही रखते हुए उसे सुनने वाले भी मात्र पांच पात्र रखे। जिन में दो पात्र बर्बरीक एवम हनुमान जी स्वयं में कर्म योगी थे, संजय मात्र सुन कर सुनाने वाला था। सुनने वाले मात्र दो थे, एक धृष्टराष्ट्र और दूसरा अर्जुन। आगे किस को कितना समझ में आया, आप ही तय कर सकते है।
हर व्यक्ति अपने अनुभव, ज्ञान एवम कर्म के साथ बड़ा होता है। जिस ने ज्ञान के दरवाजे बंद कर रखे है वो ही अपने को सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी एवम अनुभवी बताता है। चाहे उस की शिक्षा, अनुभव एवम कर्मो का घर, परिवार एवम समाज मे योग दान सामान्य भी न हो। जिस ने अपने को विद्यार्थी समझा, वो ही विन्रम एवम शांत होता है।
आज विश्व के जो हालात चल रहे है, देश और पड़ोसी राज्य में जो कुछ चल रहा है, उस मे मूक प्रजा बन कर अपने ही खाने-पीने और परिवार को ले कर चलने वालों का बहुत बड़ा वर्ग है, जो संकट के समय दैव दैव पुकारते है और कष्ट सहते है और कुछ महान आत्माएं इन के विरुद्ध धर्म, समाज, देश की रक्षा के लिये अपना सब कुछ त्याग कर शिवाजी, महाराणा प्रताप, सावरकर, नेता जी सुभाष बोस, लक्ष्मीबाई जैसे नेतृत्व के उठते है तो सैकड़ो हाथ उन के साथ उठते है। लाखो फिर भी मूक प्रजा बन कर ही जीते है। यही मूक प्रजा ही रावण की सेना की जननी है, जिस में पुनः कामना और आसक्ति से भरे असुर वृति लोग वापस अपना राज्य स्थापित करते है, यही इतिहास है। आप को अपना कर्म और धर्म तय करना है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने समाज को एक दूसरे के पास लाया। संवाद सरल एवम दुरग्राही भी हुआ। किन्तु संवाद के प्रति हमारी आस्था, जिम्मेदारी, कर्तव्य सिर्फ एक पोस्ट तो दूसरी ओर भेजना रह गया। हम गलत या सही किसी के लिये अपने को जिम्मेदार नही मानते। अच्छे विचार, कथा या ग्रन्थ, मंत्र, पूजा पाठ तो एक-दूसरे के भेजने मात्र से संतुष्ट हो जाते है, किन्तु विचार करने योग्य यही है कि हमारी पुरातन धरोहर क्या सिर्फ संवाद के लिये ही है? हम क्यों किसी विषय पर गहन चर्चा से क्यों अपने को दूर रखना चाहते है। धन्य है वो वैज्ञानिक, शोधकर्ता और विचारक जो आज भी समाज के प्रति समर्पित भाव से कर्म कर रहे है।
चित्त की वृत्ति तो प्रकाशवान होने की है किंतु इन प्रकाश की किरणों को रज एवम तम गुणों की प्रवृति ने ढक रखा है। हम अपने को कितना भी गलत हो, पर गलत नही मानते, उस के आगे समर्पित है किंतु अपेक्षा दुसरो से उच्च श्रेणी की रखते है।
हमारी आस्था, ज्ञान, आध्यात्मिक धरोहर, योग, वेद, पुराण और गीता को ले कर कुछ तथाकथित गुरु एवम आध्यात्मिक लोग आज के युग मे भी हुए जिन्होंने अपने को भगवान तक घोषित कर दिया और सांसारिक प्रलोभन में पड़ कर यही प्रजा मूर्ख बनती रही। यह अध्यात्म में हुआ हो जरूरी नही, राजनीति में तो भरपूर नेता गरीबो के मसीहा बन कर उतरे और अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहे। यही हमारी दासता की मानसिकता रही कि परमात्मा किसी रूप में हमारा उद्धार करेंगे। हम गीता के वचन भूल गए कि परमात्मा के हम ही स्वरूप है, अज्ञान में हम प्रकृति हो अपना सर्वश मान कर गुलामी की जिंदगी जी रहे है। विवेकानन्द जी ने हमे “अमृत के पुत्रो” कह कर वेदों की वाणी में पुकारा था, किन्तु हम फिर भी अपने को नही जागृत नही कर पा रहे। हम स्तरीय चर्चा या ज्ञान कर के संतुष्ट है।
ज्ञान को व्यवसाय की तरह अपनाने वाले कभी निर्भय नही हो सकते क्योंकि उन का मोह उस ज्ञान से उन की सांसारिक दिनचर्या से है। अतः इन का ज्ञान स्वार्थ एवम मोह से युक्त होता है। वेद व्यास जी की गीता की समीक्षा तक को पुस्तक से रूप में व्यवसाय करने वाले ज्ञानी है किन्तु ज्ञान के प्रसार करने वाले उन असंख्य ऋषि मुनियों की कोई नही जानता जिन्होंने हजारों साल पहले वेद की ऋचाओ की रचना की। वो लोग तत्वदर्शी थे, ज्ञानी थे, मोह एवम कामनाओं से मुक्त थे। किन्तु आज भी अपने को बुद्धिजीवी मानने वाला वर्ग कामना-आसक्ति और अहम में ग्रसित हो कर जी रहा है। वह स्वार्थ में इतना अंधा है कि चंद पैसों के असुरवृति के लोगों के लिए कुछ भी करता है, उस के गीता भी व्यवसाय का ही माध्यम है।
Communication के बारे में यह नियम है कि हम सुनने से पूर्व ही react करते है जिस को अर्ध सत्य भी बोल सकते है। पूरा सुनने के बाद अपनी शंका का समाधान कैसे करना चाहिए यह अर्जुन के समान पात्र बन कर ही कर सकते है। व्यक्त्वि विकास, जीवन शैली एवम जीवन का क्या उद्देश्य होना चाहिए, प्रबंधन की दृष्टि से गीता से बढ़ कर कोई पुस्तक नही। क्योंकि गीता ही समस्त वेदो एवम उपनिषदों का सार है। इस लिये विश्व मे इस को सब से अधिक भाषायों में अनुवादित किया गया है।
अक्सर ज्ञान की लालसा सभी मे होती है, किंतु कोई भी इसे प्राप्त करने के लिये प्रयत्न नही करना चाहता। कुछ ही इस के अभ्यास करते है और ज्ञान को प्राप्त होते है, बाकी इसे अपने ड्राइंग रूम में शोभा जैसे सज़ा कर रखते है, ताकि समाज मे यह कह सके कि उन के पास भी ज्ञान का भंडार है। उन्हें इसे प्राप्त करने के किसी दैवीय चमत्कार की आशा लगती है जैसे बचपन मे डॉक्टर, इंजीनयर बनना किन्तु जब पढ़ाई शुरू करते है तभी मालूम पड़ता है कितनी एकाग्रता एवम शक्ति लगानी पड़ती है।
अतः विचारणीय यही है कि हम अपने कर्तव्य कर्म के लिये किंतने शिक्षित है? हमारा गीता पढ़ने का उद्देश्य क्या है? क्या हम अपने धर्म, कर्तव्य और समाज के नैतिक एवम न्यायिक मूल्यों की रक्षा एवम सुरक्षा के कुछ कर रहे है या उस मे भी सेंध लगा कर उसे कमजोर कर रहे है? विचारणीय यही है कि अर्जुन की भांति ज्ञान ले रहे है या दुर्योधन की भांति यह मानते की धर्म, न्याय, नैतिकता सभी जानते हुए भी, हम अपनी अपनी वृत्तियों, कामनाओं, आसक्ति से मजबूर है? क्यों हम अपने मन के आगे विवश है? यह यक्ष प्रश्न हमेशा प्रत्येक अध्ययन कर्ता के सामने है कि वह जो चाहता है वह मन के कारण ही नही कर पाता। इस मन को कैसे वश में किया जा सकता है जिस ने बड़े बड़े योगी पुरुषों तक को भटका दिया है ??
गीता या पौराणिक ग्रंथ पढ़ते समय हमारे दिमाग में विद्वानों का जो चरित्र चित्रण आता है, वह ऋषि मुनि, आधुनिक साधनों से रहित साधारण रहन सहन का आता है। उसे 21वीं सदी में हम अव्यवहारिक मान लेते है। उसी प्रकार नैतिक और सामाजिक मूल्यों का भी मूल्यांकन करते है। किंतु सनातन धर्म की विशेषता यही है, जो उस समय सत्य था, वह आज भी है और भविष्य में भी रहेगा, चाहे वह ज्ञान 5000 या 10000 साल या उस से भी अधिक भी पुराना क्यों न हो। व्यवहारिक शंकाए तो अर्जुन को भी थी, परंतु वह जिज्ञासु और जागरूक शिष्य था, इस लिए वह आदर के साथ अपनी हर शंका का निवारण भी साथ साथ करता था। यदि हम ने किसी अज्ञान को पाल कर ज्ञान ले भी लिया, तो वह अज्ञान पूरे ज्ञान को अज्ञान में बदल देता है। इसलिए आधे अधूरे ज्ञानी से ज्ञान को प्राप्त करने के साथ, उसे अनुभव और अभ्यास से पूर्णता देना आवश्यक है।
और अंत में यह भी समझना जरूरी है कि ज्ञान गुरु को शिष्य की तलाश नही होती, शिष्य को गुरु की तलाश है। किंतु हम जिज्ञासा या परखने के नाम पर जब गुरु की परीक्षा लेते है या अपने ज्ञान की शेखी मारते है तो गुरु के प्रति आदर कैसे होगा। यदि आदर नहीं होगा तो ज्ञान कैसे मिलेगा। ज्ञान नही मिलता तो जो बताया जाता है, वह नीरस हो जाता है। नीरस होने से समझ में नहीं आता। समझ में नही आता तो जिस ज्ञान के लिए आगे बढ़े थे, पीछे हटना होता है और उस दोष भी ज्ञान देने वाले के मत्थे चढ़ जाता है। इसलिए जब मन में किसी भी विषय या ज्ञान प्राप्ति का निश्चय कर लिया हो तो मुमुक्षु की भांति दिन रात एक कर के उस को प्राप्त करना ही चाहिए। जिंदगी में अज्ञानी बन कर सांसारिक सुख के पीछे भागते हुए जीवन जीना भी कोई बुरा नही किंतु सांसारिक सुखों के लिए आध्यात्मिक स्वरूप के साथ भगवान से प्रार्थना करना, ज्ञान का दुरुपयोग ही है। योग में दर्शन किसी और का हो तो वह मार्ग समझने के सही हो सकता है किंतु आत्म दर्शन तो मुक्ति के अनिवार्य है। इसलिए अब हम शुद्धता के साथ मुमुक्षु हो कर आगे बढ़ते हैं।
।। हरि ॐ तत सत ।। विशेष 6.32 ।।
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