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% - Shrimad Bhagwat Geeta

।। Shrimadbhagwad Geeta ।। A Practical Approach  ।।

।। श्रीमद्भगवत  गीता ।। एक व्यवहारिक सोच ।।

।। Chapter  10.12 II

।। अध्याय      10.12 II

॥ श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ॥ 10.12

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्‌ ।

पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌॥

“arjuna uvāca,

paraḿ brahma paraḿ dhāma,

pavitraḿ paramaḿ bhavān..।

puruṣaḿ śāśvataḿ divyam,

ādi-devam ajaḿ vibhum”..।।

भावार्थ: 

अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! आप परमेश्वर हैं, आप परब्रह्म हैं, आप परम-आश्रय दाता हैं, आप परम-शुद्ध चेतना हैं, आप शाश्वत-पुरुष हैं, आप दिव्य हैं, आप अजन्मा हैं, आप समस्त देवताओं के भी आदिदेव और आप ही सर्वत्र व्याप्त हैं। (१२)

Meaning:

Arjuna said:

You are the supreme absolute, the supreme abode, supremely pure. You are the divine eternal person, the original deity who is beyond birth, all-pervading.

Explanation:

Over the course of the previous chapters and last four verses, Arjun is convinced entirely about the supreme position of Shree Krishna and emphatically vents the deep conviction and understands that Shri Krishna as an avatara, a divine manifestation of Ishvara. He now feels within himself the real nature of Ishvara.  When great authorities testify knowledge, its credibility gets established. The great saints are the authorities for spiritual knowledge. Thus, Arjun quotes the saints who have proclaimed Shree Krishna as the Supreme Divine Personality and the cause of all causes.

Arjuna spoke of Ishvara as “parama brahman” which is the absolute reality, the eternal essence that was spoken of in the second chapter. He understood that Ishvara’s real nature is beyond time and space, it is that which is the support of time and space. Ishvara is”parama dhaaman”, the supreme goal, the ultimate abode of all beings. Ishvara is also the supreme purifier, as he destroys all traces of impurities in the form of ignorance.

The word “purusha” literally means, one who fills the body. Ishvara is the “divyam shaashvatam purusha”, the divine eternal person who comprises the entire universe, just like all of the cells in our body are termed as “body” in aggregate. Ishvara is divine because he is beyond the realm of impermanence caused by maaya. He is “ajam”, beyond birth, but is the cause of everyone else’s birth. He is “vibhum” which is all-pervading, he alone appears as everything.

Like the Vishnu Sahasranaam that enumerates a thousand names of Ishvara, this shloka can be used as a prayer to meditate upon Ishvara’s glories. Now, did only Arjuna think that this was the real nature of Ishvara or did others as well? Arjuna takes this up in the next shloka.

।। हिंदी समीक्षा ।।

यह श्लोक युग्म श्लोक है, अतः अगले श्लोक के साथ पूर्ण होगा। परमात्मा द्वारा बताई गई विभूति को और योग के अभी तक के ज्ञान को सुनकर अर्जुन पुर्णतयः प्रभावित और कृष्ण के प्रति समर्पित हो कर उसे ही सगुण ब्रह्म के रूप में स्वीकार करते हुए, बोलते है, “आप परम ब्रह्म परमात्मा, परमधाम, परमतेज और परमपावन हैं तथा आप नित्य और दिव्य पुरुष हैं अर्थात् देवलोक में रहनेवाले अलौकिक पुरुष हैं एवं आप सब देवों से पहले होनेवाले आदिदेव, अजन्मा और व्यापक हैं।”

श्रुति ब्रह्म के विषय मे कहती है “जिस में ये प्राणी उत्पन्न होते है उत्पन्न हो कर जीवन धारण करते है और मर कर जिस में लय होते है- उस को जानने की इच्छा करो, वह ही ब्रह्म है। स्मृति कहती है कि आप अपने तेज से अंधकार को नष्ट कर देते है। आप का तेज इतना है कि सहस्त्र सूर्य एक साथ उदित हो, तो भी आप के समान प्रकाश शायद ही हो”

अर्जुन वैदिक साहित्य और शास्त्र ज्ञान से शाब्दिक भाव में परिचित था। वह यहाँ कहता है कि प्राचीन ऋषियों ने अनन्त सनातन सत्य को जिन शब्दों के द्वारा सूचित किया है, उससे वह परिचित है, जैसे परं ब्रह्म, परं धाम, परम पवित्र आदि। परन्तु उस ने अब तक यही समझा था कि ये सब परम सत्य के गुण हैं। इसलिए, जब वह भगवान् को इन्हीं शब्दों का प्रयोग स्वयं के लिए करते हुए सुनता है, तब वह कुन्तीपुत्र आश्चर्यचकित रह जाता है। उसे समझ में नहीं आता कि वह अपने रथ सारथि श्रीकृष्ण को विश्व के आदिकारण के रूप में किस प्रकार जाने व्यावहारिक बुद्धि का व्यक्ति होने के नाते अर्जुन को श्रीकृष्ण के स्वरूप को समझने के लिए अधिक तथ्यों की जानकारी की आवश्यकता थी। किन्तु अपना मित्र, सखा और रिश्तेदार समझने वाले कृष्ण का यह स्वरूप उस के लिये अत्यंत आश्चर्य चकित करने वाला था। उस की भावना कृष्ण के प्रति बदल कर आदर और सम्मान की हो गई थी और उस की उत्सुकता भगवान श्री कृष्ण के वास्तविक सगुण से निर्गुण निराकार स्वरूप को समझने और जानने की बढ़ गई थी।

हम देखेंगे कि उस की मांग को पूर्ण करने हेतु इसी अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने परब्रह्म के स्वरूप और विभूतियो की पर्याप्त सूचनाएं और तथ्य प्रस्तुत किये हैं। परन्तु, अर्जुन को सन्तुष्ट करने के स्थान पर वह जानकारी उस की उत्सुकता को द्विगुणित कर देती है और वह बाध्य होकर भगवान् से उन के विश्वरूप को दिखाने की मांग आगे प्रस्तुत करता है भक्तवत्सल करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अगले अध्याय में अपने विश्वरूप को दर्शाकर अर्जुन को कृतार्थ कर देते हैं।

यद्यपि अर्जुन ने इस के पूर्व भी परम पुरुष आदि शब्दों को ऋषियों से सुना था, किन्तु उसे वे अर्थहीन और निष्प्रयोजन ही प्रतीत हुए थे। उसका आश्चर्य इन शब्दों में स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है कि आप भी मेरे प्रति ऐसा ही कहते हैं। यहाँ उनके कुछ आश्चर्यचकित एवं भ्रमित होने का अवसर इसलिए था कि वह समझ नहीं पाया कि उस के समकालीन श्रीकृष्ण जो उसके समक्ष खड़े थे, जिन्हें वह कई वर्षों से जानता था और जो उसके सम्बन्धी भी थे किस प्रकार अनन्त, परम, जन्मरहित और सर्वव्यापी हो सकते हैं। अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को अपने चर्म चक्षुओं से देखता है और इसलिए उसे उनका केवल शरीर ही दिखाई देता है। सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण स्वयं को आत्मस्वरूप में ही प्रकट करते हैं और न कि समाज के एक सदस्य के रूप में। गीता के उपदेष्टा श्रीकृष्ण परमात्मा हैं, वसुदेव के पुत्र या गोपियों के प्रियतम नहीं। श्रीकृष्ण को सदैव मित्र या प्रेमी अथवा एक विश्वसनीय बुद्धिमान्, कूटनीतिज्ञ के रूप में देखते रहने से अर्जुन आत्मस्वरूप श्रीकृष्ण को पहचान नहीं पाया। यही उसके आश्चर्य और भ्रम का कारण था।

व्यावहारीरिक दृष्टिकोण से जब तक हम किसी से मिल कर बात चीत नही करते, हमे उस व्यक्ति की शख्सियत नही मालूम होती। हम उस व्यक्ति के बारे में सुनी सुनाई धारण ले कर चलते है। जो व्यक्ति ज्ञान की गहराई तक गहरा है वो सहज हर व्यक्ति को ज्ञान नही देता जब तक सुनने वाला उस को श्रद्धा एवम प्रेम से न सुने।

किसी समर्थ और महान व्यक्तित्व की स्तुति करने से सहज एक आत्मज्ञान की उपलब्धि होती है, जो हमारे मनोबल को बढ़ाने में सहायक होती है। परमात्मा की स्तुति करने का प्रयोजन यही है कि हम अपने उस ब्रह्म स्वरूप को पहचाने जिस के हम अंश है और अपने व्यक्तित्व को और ऊपर उठाएं।

आगे के श्लोक से अर्जुन परमात्मा के रूप में कृष्ण को देखना शुरू कर देता है इसलिये अब उस की भाषा एवम अहम मित्र, सखा, गुरु या रिश्तेदार की भाषा मे न हो कर परमात्मा की स्तुति की भाषा मे परिवर्तित हो गई। यह समर्पण और भक्ति की भाषा है। जिसे हम आगे पढ़ेगे एवम फिर परमात्मा की विभिन्न विभूतियों को जानेंगे।

तुलसीदास जी यह पंक्तियां ”  हरि व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम तें प्रकट होहिं मै जाना।।” परमात्मा के भक्ति मार्ग की पराकाष्ठा को बतलाती है। क्योंकि यह युग्म श्लोक है, अतः स्तुति में अर्जुन आगे क्या कहते है, पढ़ते है।

।। हरि ॐ तत सत।।10.12।।

Complied by: CA R K Ganeriwala (+91 9422310075)

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