।। Shrimadbhagwad Geeta ।। A Practical Approach ।।
।। श्रीमद्भगवत गीता ।। एक व्यवहारिक सोच ।।
।। Chapter 10.11 II
।। अध्याय 10.11 II
॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥ 10.1 1॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
“teṣām evānukampārtham,
aham ajñāna-jaḿ tamaḥ..।
nāśayāmy ātma-bhāva-stho,
jñāna-dīpena bhāsvatā”..।।
भावार्थ:
हे अर्जुन! उन भक्तों पर विशेष कृपा करने के लिये उनके हृदय में स्थित आत्मा के द्वारा उनके अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी दीपक के प्रकाश से दूर करता हूँ। (११)
Meaning:
For those, only out of compassion, I dispel darkness residing in their hearts, born of ignorance, by lighting the brilliant lamp of knowledge.
Explanation:
Shri Krishna paints a beautiful picture to illustrate Ishvara’s grace that was explained in the previous shloka. Like a lamp that is lit to dispel darkness, Ishvara, out of sheer compassion, ignites the yoga of intellect which removes ignorance from the hearts of serious devotees.
The renowned Shankaracharya has elaborated upon this illustration in his Gita commentary. His illustration is comprised of the lamp with a lamp holder, wick, and oil. The lamp holder is the quality of vairagya or dispassion, the wick is brahmacharya or continence and the oil is prasaada buddhi or the willingness to accept everything in life as Ishvara’s blessing. The lamp is nourished by a gentle breeze in the form of constant devotion to Ishvara but can be extinguished by an impure mind containing strong likes and dislikes. If the physics teacher has to light the lamp of physics knowledge, there is only one method; consistent, systematic teaching and for student to do active listening, thinking and implementing i.e. shrawan, Manan and nididhyaasan.
At present, our senses, mind, and intellect are all material, while God is divine. Hence, we are unable to see him, hear him, know him, or be united with him. When God bestows his grace, he confers his divine Yogmaya energy upon the soul. It is also called śhuddha sattva (divine mode of goodness), which is distinct from the sattva guṇa (mode of goodness) of Maya. When we receive that śhuddha sattva energy, our sense, mind, and intellect become divine. To put it simply, by his grace, God bestows his divine senses, divine mind, and divine intellect to the soul. Equipped with these divine instruments, the soul is able to see God, hear God, know God, and be united with God. Hence, the Vedānt Darśhan states: “Only by God’s grace does one gain divine knowledge.”
With these two shlokas, Shri Krishna summarizes the path of the bhakti marga or devotional means to attain Ishvara. In bhakti, Ishvara’s grace is emphasized rather than individual effort. In the Indian tradition this is pictorially depicted by comparing a monkey with a cat. In “markatanyaaya”, the method of the monkey, a baby monkey has to hang on to its mother with its own effort. But in “marjalanyaaya”, the method of the cat, a kitten does not have to do anything because its mother holds her by its neck.
Likewise, Ishvara takes care of his devotees. He will ensure that their material needs are taken care of. But more importantly, he will ensure that all our ignorance is destroyed and that we are educated spiritually. This is in contrast with other paths to Ishvara that require significant self effort. There is no need to roll any beads or sit in any postures. All that is required is surrender.
With these words, Shri Krishna stopped speaking and Arjuna, excited by the topic, started praising him.
।। हिंदी समीक्षा ।।
उन भक्तों के हृदय में कुछ भी सांसारिक इच्छा नहीं होती। इतना ही नहीं, उन के भीतर मुझे छोड़ कर मुक्ति तक की भी इच्छा नहीं होती। अभिप्राय है कि वे न तो सांसारिक चीजें चाहते हैं और न पारमार्थिक चीजें (मुक्ति, तत्त्वबोध आदि) ही चाहते हैं। वे तो केवल प्रेम से मेरा भजन ही करते हैं। उन के इस निष्कामभाव और प्रेमपूर्वक भजन करने को देख कर मेरा हृदय द्रवित हो जाता है। मैं चाहता हूँ कि मेरे द्वारा उन की कुछ सेवा बन जाय, वे मेरे से कुछ ले लें। परन्तु वे मेरे से कुछ लेते नहीं तो द्रवित हृदय होने के कारण केवल उन पर कृपा करने के लिये कृपा परवश हो कर मैं उन के अज्ञानजन्य अन्धकार को दूर कर देता हूँ। मेरे द्रवित हृदय होने का कारण यह है कि मेरे भक्तों में किसी प्रकार की किञ्चिन्मात्र भी कमी न रहे।
ज्ञानी मनुष्य का सामर्थ्य धारण, ध्यान और समाधि तक और श्रद्धा, विश्वास और प्रेम से स्मरण और समर्पित भक्त के सामर्थ्य भक्ति अपने को भगवान के प्रति बिना किसी कामना और आसक्ति से समर्पण तक है। अतः परमात्मा का ज्ञान उसे ही होता है, जिस पर परमात्मा की कृपा हो। किन्तु ज्ञानी अपने इन्द्रिय- मन- बुद्धि से वेद और शास्त्रों के अध्ययन और योग एवम समाधि से अपने को उस उच्च स्तर तक ले जाता है जहां वह ब्रह्म के जान सके। किन्तु यह सभी के लिये संभव नही, अतः भक्त अपने अनुशासन से अपनी कामना, आसक्ति और अहम को परमात्मा में प्रेम, श्रद्धा और विश्वास के साथ समर्पित कर देता है कि उसे मोक्ष की भी कामना नही रहती तो उस की मुक्ति के भार परमात्मा उठाता है और उस के अज्ञान को दूर कर के उसे प्रकाशवान बना देता है। प्रत्येक जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है। प्रकृति के संयोग से भ्रमित ही कर कर्ता भाव एवम भोक्ता भाव मे रहता है। अतः प्रकाशवान यदि किसी वस्तु , धूल, मिट्टी से ढक जाए तो उस के इस अज्ञान को हटाना मात्र ही ज्ञान है। जब अर्जुन ने भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की थी तब भी भगवान ने कहा कि प्रकृति की दृष्टि से तुम मुझे नही देख सकते, इस के लिये मैं तुम्हे दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ। इसलिये प्रकृति द्वारा प्रदत्त इंद्रिया, मन एवम बुद्धि में परमात्मा को देख पाना या समझ पाना संम्भव नही यह तो तभी संभव है जब परमात्मा स्वयं कृपा कर के ज्ञान दे और दर्शन दे।
प्रकाशमान ज्ञान दीपक के द्वारा उन प्राणियों के अज्ञानजन्य अन्धकार का नाश कर देता हूँ। तात्पर्य है कि जिस अज्ञान के कारण मैं कौन हूँ और मेरा स्वरूप क्या है ऐसा जो अनजानपना रहता है, उस अज्ञान का मैं नाश कर देता हूँ अर्थात् तत्त्वबोध करा देता हूँ। जिस तत्त्वबोध की महिमा शास्त्रों में गायी गयी है, उस के लिये उन को श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि साधन नहीं करने पड़ते, कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता, प्रत्युत मैं स्वयं उनको तत्त्वबोध करा देता हूँ।
कभी कभी कोई वस्तु विद्यमान होते हुए भी हमारी दृष्टि के लिए आच्छादित रहती है, क्योंकि उसे देखने के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। ध्वनि सुनने के लिए उस में आवश्यक स्पन्दन होने चाहिए तथा यह भी आवश्यक है कि वे ध्वनि तरंगे हमारे कानों तक पहुँचे। इसी प्रकार, अपेक्षित प्रकाश के अभाव में वस्तु के समक्ष होने पर भी उस का नेत्रों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। यदि हम अन्धकार में मेज पर पड़ी अपना कुंजी (चाभी) को टटोल कर खोज रहे हों और उसी समय कोई व्यक्ति स्विच दबाकर कमरे को प्रकाशित कर देता है, तो हमें अपनी कुंजी दिखाई पड़ती है। हम कह सकते हैं कि उस व्यक्ति के इस दयापूर्ण कार्य ने हमें कुंजी की प्राप्ति करायी, परन्तु यह कहना सर्वथा असंगत होगा कि प्रकाश ने उस कुंजी को उत्पन्न किया।इस दृष्टान्त के द्वारा वेदान्त में यह ज्ञान कराया जाता है कि आत्मा तो सदा हमारे हृदय में ही विद्यमान है, किन्तु प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण यथार्थ अनुभव के लिए उपलब्ध नहीं है। उन प्रतिकूल तत्त्वों की निवृत्ति होने पर वह आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप से अनुभव किया जा सकता है। आत्मा को आच्छादित करने वाला वह आवरण है अज्ञानजनित अंधकार। स्मरण रहे कि इस अज्ञान अवस्था में भी आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप से विद्यमान रहता है, परन्तु हमारे साक्षात् अनुभव के लिए उपलब्ध नहीं होता। जो साधक बुद्धियोग में दृढ़ स्थिति प्राप्त कर लेते हैं, वे आत्मा के अपरोक्ष ज्ञान के पात्र बन जाते हैं। बुद्धियोग की साधना अवस्था में ध्याता और ध्येय में भेद होता है, जिसे सविकल्प समाधि कहते हैं। इस श्लोक में यह कहा गया है कि इस सविकल्प अवस्था से वह साधक, मानो किसी ईश्वरीय कृपा से पूर्ण निर्विकल्प समाधि की स्थिति में स्थानान्तरित किया जाता है। वस्तुत, सविकल्प समाधि की स्थिति तक ही साधक अपने पुरुषार्थ के द्वारा पहुँच सकता है। यह बुद्धियोग भी मानो किसी अन्य स्थान से प्राप्त होता है, तात्पर्य यह है कि वह कोई सावधानीपूर्वक किये गये किसी प्रयत्न का फल नहीं, वरन् सहज स्वाभाविक आंशिक दैवी प्रेरणा है। अहंकार और शुद्ध आत्मा के मध्य का सघन कुहासा जब विरल हो जाता है, तब इस दैवी प्रेरणा का अनुभव होता है। जब यह कोहरा पूर्णतया नष्ट हो जाता है, तब पूर्ण आत्म साक्षात्कार अपने स्वयंप्रकाश स्वरूप में होता है।एक अन्धेरे कमरे में मेज पर रेडियम के डायल की एक घड़ी रखी हुई है, जिस पर कागज, पुस्तक आदि पड़े हुए होने से वह दिखाई नहीं देती। जब कोई व्यक्ति अन्धेरे में ही उसे खोजता हुआ उन कागजों को हटा देता है, तो वह घड़ी स्वयं ही चमकती हुई दिखाई पड़ती है। उसकी चमक ही उसकी परिचायक होती है। सनातन सत्य भी अज्ञान से आवृत्त हुआ अभाव रूप प्रतीत हो सकता है, किन्तु अज्ञान की निवृत्ति होने पर, वह स्वयं अपने प्रकाश से ही प्रकाशित होता है, और उसे जानने के लिए अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती। जब अज्ञान का अन्धकार, प्रकाशमय ज्ञान के दीपक से नष्ट हो जाता है तब आत्मा अपने एकमेव अद्वितीय, सर्वव्यापी और परिपूर्ण स्वरूप में स्वत प्रकट होता है। अपने भक्तों के हृदय में स्थित स्वयं भगवान् इस आत्मा के प्रकटीकरण की क्रिया को उनके ऊपर अनुग्रह करने के भाव से सम्पन्न करते हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि यह अनुग्रह स्वयं के ऊपर ही है। जब मैं चलतेचलते थक जाता हूँ तब मैं किसी स्थान पर बैठ जाता हूँ केवल अपने ही प्रति अनुकम्पा के कारण। इस अनुकम्पा के लिए उचित मूल्य चुकाये बिना साधक को सीधे ही इस की प्राप्ति नहीं हो सकती। दिन के समय, मेरे कमरे की खिड़कियां खोल देने पर, सूर्य प्रकाश अनुकम्पावशात् मेरे लिए कमरे को प्रकाशित करता है। जैसा कि हम जानते हैं कि जब तक वे खिड़कियां खुली रहती हैं, तब तक सूर्य को यह स्वतन्त्रता नहीं है कि वह अपनी दया का द्वार बन्द कर ले। उसी प्रकार उसकी दया तब तक प्रकट भी नहीं होगी, जब तक मैं अपने कमरे की खिड़कियां नहीं खोल देता हूँ। संक्षेपत, सूर्य प्रकाश का आह्वान उसी क्षण होता है, जब उसके मार्ग का अवरोधक दूर हो जाता है।इसी प्रकार, प्रारम्भिक साधनाओं के अभ्यास से साधक बुद्धियोग का पात्र बनता है। तत्पश्चात् इस के निरन्तर प्रयत्नपूर्वक किये गये अभ्यास से वह अज्ञान तथा तज्जनित विक्षेपों के आवरण को सर्वथा नष्ट कर देता है। तत्काल ही आत्मा अपने स्वयं के प्रकाश में ही प्रकाश स्वरूप से प्रकाशित होता है। मेघों को चीरकर जाती हुई विद्युत् को देखने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती।
जीवन के सर्वोच्च व्यवसाय अथवा लक्ष्य चित्तशुद्धि और आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति के लिए दिये गये उपदेश का खण्ड यहाँ पर समाप्त हो जाता है, तथापि अर्जुन को इससे सन्तोष नहीं होता और इसलिए वह अपनी शंका को व्यक्त करते हुए भगवान् से सहायता के लिए अनुरोध करता है, जिससे कि साक्षात् अनुभव के द्वारा वह स्वयं सत्य की पुष्टि कर सके।भगवान् के मुख से उनकी विभूति और योग के विषय में श्रवण कर, अर्जुन अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है। इसे हम अब हम आगे पढ़ते है।
।।हरि ॐ तत सत।। 10.11।।
Complied by: CA R K Ganeriwala (+91 9422310075)