।। Shrimadbhagwad Geeta ।। A Practical Approach ।।
।। श्रीमद्भगवत गीता ।। एक व्यवहारिक सोच ।।
।। Chapter 05. ।। Summary II
।। अध्याय 05. ।। सारांश II
॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥ अध्याय: ५ सारांश॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसांख्ययोगो नाम पंचमोऽध्यायः॥
*||ōṃ tatsaditi śrīmadbhagavadgītāsūpaniṣatsu brahmavidyāyāṃ yōgaśāstrē
śrīkṛṣṇārjunasaṃvādē karmasannyāsayōgō nāma pañcamō’dhyāyaḥ||*
भावार्थ :
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद् भगवद् गीता के श्रीकृष्ण- अर्जुन संवाद में कर्मसांख्य- योग नाम का पाँचवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ॥
Meaning:
Thus ends the fifth chapter named Sannyasa- yōga in SrimadbhagavadGītā which is the essence of the Upanishads, which deals with Brahman- knowledge as well as the preparatory disciplines, and which is in the form of a dialogue between Lord Krishna and Arjuna.
॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥
Summary of Bhagvad Gita Chapter 5:
The fifth chapter titled “Karma Sanyaasa Yoga” began with Arjuna’s question to Shri Krishna. The question was : what was better, renouncing all actions and becoming a monk, or performing actions as a karma yogi? Shri Krishna addressed this question by reiterating a nuance that Arjuna had missed.
Renouncing of actions did not mean giving up the physical performance of actions, it meant renouncing the sense of doership, the sense that “I am doing something”. In order to get to this stage, one has to have purified one’s mind completely of desires. In that regards, performing actions in the spirit of karmayoga was the correct course of action for Arjuna, since he still harboured desires. As one continues to dedicate the result of actions to Ishvara, one’s sense of enjoyership and doership automatically diminishes.
Next, Shri Krishna expounded upon the vision of realized seeker. He provided a detailed illustration of body, mind and intellect functioning on their own, including the acts of perception, cognition and intellect’s response to stimuli. All these acts in reality happen without the involvement of “I”. The illustration that the “I” resides in a city of nine gates was given to further drive home the point.
Another aspect of the realized seeker’s vision is his “sama drishti” or the sameness of vision. The realized seeker sees the same eternal essence in a human, elephant, dog, dog eater. Not only that, he also sees the same eternal essence in positive and negative experiences.
He holds the convictions that these “defects” or modifications are part of prakriti. He does not view these defects as part of the eternal essence since the eternal essence is ever perfect.
Then Shri Krishna explained that just like the eternal essence in the body does not cause action, so too does the eternal essence at the cosmic level not cause action. Neither does the eternal essence connect results to actions, nor does it dole out sin and merit. All these transaction happen inside prakriti or nature. The example of the Pac Man video game was given in order to illustrate that prakriti is an automated system that works just like a video game. It rewards and punishes actions based on well-defined rules, without the need for external intervention.
In the closing shlokas of the fifth chapter, Shri Krishna slowly begins pointing us toward meditation. Meditation is the only way for the seeker to get fully established in the eternal essence. The primary goal has to be the realization of eternal essence and nothing else, this thirst is needed. Next, Shri Krishna informs us that it is the sense contacts that are obstacles to meditation. Our mind rushes our due to the urges generated desire and anger. Only by controlling this urge can we progress towards meditation.
Lastly, Shri Krishna elaborates on the state of a liberated seeker. Such a seeker has discovered the infinite joy within himself. He finds no need to rush outside into the world for joy and bliss.
।। हिंदी समीक्षा- सारांश ५ ।।
पांचवे अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन की दुविधा से होता है जिस में उस की युद्ध नहीं करने की इच्छा झलकती है। वो कर्मयोग एवम सांख्य योग में क्या श्रेष्ठ है, प्रश्न करते है। किंतु अभी भी वो सांख्य योग से युद्ध किये बिना परमतत्व को प्राप्त करने की आशा रखते है।
अतः यहां भगवान स्पष्ट करते है कर्मयोग एवम सांख्य योग एक ही मंजिल के दो रास्ते है किंतु कर्मयोग सरल एवम ग्राह्य है अतः कर्मयोग श्रेष्ठ है। भगवान यहां यह भी स्पष्ट करते है पूर्णतयः कर्म का त्याग असंभव है, इसलिये कर्म के कर्ता और भोक्ता भाव का त्याग करना चाहिए।
मोक्ष के दो मार्ग प्रवृति एवम निवृति में मनुष्य को अपने काम एवम क्रोध के वेग को नियंत्रित करना होता है, जिस से वह कामना एवम आसक्ति से मुक्त हो। कर्म में इच्छा या कामना की सहज गति होती है, जिस को प्रारब्ध एवम संचित कर्मफल के द्वारा जीव को कर्म के लिये प्रकृति बाध्य करती है। निष्काम कर्मयोग से यह वेग सांख्य योग की अपेक्षा अधिक सरलता से किया जा सकता है। सांख्य योग में कर्म के निषेध से यह कार्य किया जाता है जो सदाहरण जीव से कठिनतम एवम दुष्कर है। कामना एवम आसक्ति के त्याग से ज्ञान की उत्पत्ति होती है। अतः दोनो मार्ग एक ही लक्ष्य तक पहुचने के दो मार्ग है। इस मे निष्काम कर्मयोग सहज होने से सभी के लिये सुलभ एवम श्रेष्ठ है।
ज्ञान से प्राप्त जीव में जब अहम भी समाप्त हो जाता है जो ब्रह्म और जीव का द्वैत भाव नष्ट हो जाता है और जीव एवम ब्रह्म अद्वैत स्वरूप में एकाकार हो जाते है। जीव को जीवत अवस्था मे ही पूर्णब्रह्म की अवस्था हो जाती है जिसे ब्रह्मसन्ध कहा गया है।
हमने पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त जीव के लक्षणों को जाना। इस स्थान को प्राप्त करने के लिये ज्ञान की आवश्यकता रहती है। ज्ञान प्राप्ति से अहम,कृतर्त्व भाव, भोक्तत्व भाव को समाप्त होना चाहिए। आत्मा साक्षी मात्र है और देह से की गई समस्त क्रियाए प्राकृतिक है।
पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त जीव ब्रह्मसंस्थ कहा जाता है। ब्रह्मसंस्थ प्राणी में समत्व भाव रहता है, वो हर प्राणी में परमात्मा और सिर्फ परमात्मा को देखता है। उस ने काम क्रोध को समाप्त कर दिया है। उस के ब्राह्मण, शुद्र, पशु सभी समान है।
भगवान यह भी स्पष्ट करते है अज्ञानी लोग ही कर्म योग एवम सांख्य योग में भेद करते है। भगवान को हर काम के लिए जिम्मेदार मानते है जब कि वो मात्र साक्षी है। जो कुछ होता है वो प्रकृति जन्य है वो कुछ भी नही करता।
ब्रह्मसन्ध स्वरूप जीव के जिन गुणों का वर्णन इस अध्याय में किया गया है, वह हम संसार मे उच्च शिखर में पहुचे लोगो मे अक्सर देखते है। व्यवहारिक दृष्टिकोण से यदि उच्चतम शिखर में पहुचे व्यक्ति के गुण का विवेचन करे तो हमे इन्ही गुणों के अधिकतम गुण उस व्यक्ति में मिलेंगे। यह गुण निम्न प्रकार से है।
1. परमात्मा स्वरूप में दृढ़ निष्ठा
2. समभाव
3. स्थितप्रज्ञ
4. अंतःकरण में रमण एवम आनन्द लेना
5. बाह्य जगत के सुख या इन्द्रीयजनित सुखों में कोई कामना या रुचि या आसक्ति न रखना
6. काम एवम क्रोध में नियंत्रण
7. यतात्मानः
8. क्षीणकल्मषाः
9. छिन्नद्वैधा
10. सर्वभूतहिते रताः
11. संशय रहित
12. शांतचित्त
हमे यह भी समझ लेना चाहिए कि सन्यास का अर्थ केवल गेरूवे वस्त्र पहन कर घर त्याग कर जंगलों में घूमना नही है। सन्यास का अर्थ उपरोक्त गुणों से युक्त हो कर जीवन व्यतीत करना है। इसे गृहस्थ से ले कर कोई भी कर्मयोगी कर सकता है। इस के लिए व्याध गीता में कसाई द्वारा साधु को ज्ञान दे कर भी अधिक स्पष्ट किया गया है। जिसे हम पहले पढ़ चुके है।
कार्य-कारण एवम प्रकृति के नियमानुसार हर व्यक्ति अपने कर्मो को प्राप्त करता है। जो जैसा है उसे वैसा ही फल प्राप्त होगा।
कर्मयोग को श्रेष्ठ बताने का कारण भी स्पष्ट है क्योंकि अच्छे गुण की मात्र शुरुवात करनी पड़ती है। यदि सेवा जैसा एक भी गुण अपना ले तो आत्मोउन्नति हमे कृतर्त्व भाव से मुक्त करने लगेगी। हम स्वतः ही ब्रह्म की ओर बढ़ने लगते है और कर्मयोगी हो कर धीरे धीरे निष्काम हो कर उस परमात्मा हो हर जीव में देखने लगे जाते है। ब्रह्मसंस्थ कोई विद्या नही वरन स्थिति है जो निष्काम एवम ज्ञान द्वारा कर्म करते करते प्राप्त हो जाती है। जरूरत एक छोटे से छोटे से शुरुवात की है। यदि हम सिर्फ इतना ही विचार कर ले कि हम किसी का बुरा नही करेंगे, बुरा नहीं सोचेंगे एवम क्रोध नही करेंगे तो भी आप के अंदर मूलभूत तत्व प्रवेश कर लेंगे। आलस्य एवम प्रमाद को त्याग कर ही आप को इस का पालन करना है तो आप की यात्रा तत्वदर्शन की ओर शुरू हो जाएगी।
LLM, CA या डॉक्टर की पढ़ाई की शुरुवात nursery से ही होती है या ऐसे कहे की की बोलना ओर वस्तु को पहचानना हम घर मे माँ से सीखते है। कृष्ण भगवान ने अर्जुन को युद्ध करने को कहा था, अर्जुन को कृष्ण पर पूरा विस्वास था किंतु वो कोई संशय के साथ किसी भी कार्य को नही कर सकता अतः वो अपने संशय का निवारण कर रहा है। संशय ही ज्ञान मार्ग का सब से बड़ा बाधक है इस लिए इस को ले कर कभी भी किया हुआ कार्य सफल नही होता। बुद्धि के विकास के लिये ज्ञान की प्राप्ति संशय रहित हो कर ही करनी चाहिए।
ब्रह्म यानि मोक्ष प्राप्ति की शुरुवात भी निष्काम भाव से सेवा कर्म से होती है। यह हमारे ही सोचने का विषय है कि हमारी लालसा एवम कामना हमे किस दिशा में ले जा रही है। जो हम आज नहीं कर पा रहे है वो कल कर पाएंगे यह सुनिश्चित नही है किंतु सुखबुद्धि से हम अपने कर्मो के फल अवश्य इक्कठा कर रहे है जिसे परमात्मा कब कहाँ , कैसे और किस रूप एवम किस प्रकार में लौटाएगा यह नही मालूम, परंतु कर्मो की प्राप्ति अवश्य ही है।
किसी भी धर्म में बहुदा फल की प्राप्ति जीव के शरीर त्याग के बाद अच्छे लोक या अच्छे जन्म के रूप में दी जाती है, जो किसी ने भी नही देखा। गीता में भगवान श्री कृष्ण क्रोध और कामना के वेग को संभालने वाले, राग – द्वेष से परे जीव को परम आनंद इसी जन्म में प्राप्त होने का परिणाम देते है। इसे दृष्टा विश्वास जो आप न केवल आप देख सको, वरन उस स्थिति को प्राप्त हो कर शेष जीवन व्यतीत कर सको। ऐसा शायद ही कोई भी धर्म, मत या संप्रदाय हिंदू धर्म के अतिरिक्त बता सकता हो। फिर पुनर्जन्म से मुक्ति की बात भी है।
ब्रह्मसंस्थ एवम समत्व भाव एक स्थिति है जो प्राणी विशेष के आचरण, व्यवहार एवम क्रिया से प्रकट होती है किन्तु कोई भी अपने ब्रह्मसंस्थ या समत्व भाव होने की घोषणा नहीं कर सकता क्योंकि यदि वो ऐसा करता है वो परमतत्व को प्राप्त नहीं है, उस का अहम उस की घोषणा में है।
निष्काम कर्म योग हो या सांख्य योग, जब तक मनोचित्त शुद्धि या आत्म शुद्धि न हो, ज्ञान का प्रादुर्भाव नही हो सकता। केवल अध्ययन, श्रुति या सेवा से ज्ञान नही प्राप्त होता, इस के लिये आत्म शुद्धि एवम आत्म ज्ञान होना आवश्यक है। प्रकृति अपनी इन्द्रियों से जीव को बाह्य जगत को दिखाती है एवम मोह, लोभ, कामना एवम आसक्ति से उस मे कर्तृत्त्व एवम भोक्तत्व भाव उत्पन्न करती है। ब्रह्म स्वरूप जीव जब तक अपने स्वरूप को नही देख पाता, उसे आत्मज्ञान नही होगा। इसलिये अध्याय के अंत मे जीव को अपने स्वरूप को पहचानना भर है। आईने की धूल हटानी है। वह नित्य, साक्षी एवम अकर्ता है, इस पर भ्रम का पर्दा हटाना है। इस के ध्यान की आवश्यकता है।
जीव को कुछ प्राप्त नही करना होता, उस को अपने अज्ञान को ही समाप्त करना है। ज्ञान के ऊपर अज्ञान की परत होने से ज्ञान छुप गया है। ज्ञान प्राप्त नही किया जाना है, वह तो जीव स्वयं है ही, बस उस अज्ञान को मिटाना है। अध्याय का अंत ध्यान योग द्वारा भी समत्व प्राप्त करने की विधि द्वारा किया गया है जिसे अगले अध्याय में हम पढ़ेंगे।
।। हरि ॐ तत सत।। 5- सारांश ।।
Complied by: CA R K Ganeriwala ( +91 9422310075)