।। Shrimadbhagwad Geeta ।। A Practical Approach ।।
।। श्रीमद्भगवत गीता ।। एक व्यवहारिक सोच ।।
।। Chapter 05.15 ।। Additional II
।। अज्ञान और जीव ।। विशेष – 5.15 ।।
पूर्व श्लोक में जब यह ज्ञान द्वारा बताया जाता है कि जो भी क्रियाए हो रही है, वह प्रकृति से होती है और जीव साक्षी, अकर्ता, एवम नित्य है तो ज्ञान का उदय होता है। ज्ञान कर्मयोग, सांख्य योग, भक्ति योग एवम ध्यान योग की वह दशा या स्थिति है, जिस में जीव को ज्ञात है कि वह कर्ता भी नही है और भोक्ता भी नही है। किंतु उस का ज्ञान अभी भी अज्ञान से ढका हुआ है क्योंकि वह जो यह जानता है, और परमात्मा दो अलग अलग है।
अज्ञान और ज्ञान यद्यपि दो विपरीत से शब्द है किंतु वास्तव में नही। यह ऐसा ही है कि अंधेरे का अर्थ वहां प्रकाश का न होना। हर व्यक्ति अपने अपने अनुभव, शिक्षा एवम उम्र के हिसाब से ज्ञान रखता है। इसलिये की उस का ज्ञान आप के ज्ञान से मेल नही खाता वो अज्ञानी है, कोई किसी को अज्ञानी नही बोल सकता।
परमात्मा के विषय मे विभिन्न अनुभव, धर्म एवम धारणा के कारण जो सांख्य मत में विस्वास नही रखते उन की अज्ञानी कहना गलत है क्योंकि उन के लिए परमात्मा उदासीन नही, रक्षक, न्याय करने वाला दाता है। उन को इस विषय पर अपने अपने अनुभव भी अनेक होंगे। गीता में यह भी लिखा है कि जो उस को जिस भाव से पूजता है परमात्मा उसे उसी रूप में स्वीकार करता है।
जो लोग कठिन आराधना करते है, व्रत-उपवास, जप-तप आदि करते है, या आवेश में सर घुमाते है, या भूत-प्रेत, देवी देवताओं का आव्हान करते है, यज्ञ करते है, वह सब परमात्मा को स्वीकार होते हुए भी, परमात्मा उस के लिये अपने ऊपर कोई उत्तरदायित्व नही लेता।
यदि हम मोक्ष की बात या इस संसार की रचना की बात करे तो हमारे समक्ष सांख्य योग, कर्म योग और भक्ति योग की बात आती है। यह शरीर प्रकृति की देन है, एवम नश्वर है और इसे कोई भी इंकार नही कर सकता। कर्म बंधन में जितने भी कर्म किये जाते है उसे इसी शरीर से भोगा जा सकता है अतः उस को भोगने के लिये बार बार विभिन्न शरीर धारण करना पड़ता है। यह बंधन किसी भी आत्मा के लिये संतुष्ट दायक नही हो सकता। यह नियम इस बात का प्रतीक है कि यद्यपि ईश्वर हमारे सभी पूजे जाने वाले तरीको को उसी रूप में स्वीकार करता है जिस रूप में हम पूजते है किंतु वह हमारे कर्म के फल को स्वीकार नही करता और कर्म के फल शरीर के साथ चेतन को तब तक भोगने पड़ते है जब तक उस का चेतन अपने अहम एवम कामना को त्याग कर चेतन्य हो कर आत्मा से नही मिल जाता।
इस क्रम से मुक्ति का मार्ग ही इन तीनो योगों का ज्ञान योग है। जो इस मार्ग को नही जानता अर्थात जिस ने अपने स्थित इस ज्ञान को प्रकाशित नही किया वो अज्ञान में है ऐसा माना जा सकता है। क्योंकि किसी भी मार्ग से हम चले अंत मे वो सभी एक ही स्थान पर मिलते है।
क्योंकि ज्ञान युक्त परमतत्व अकर्ता एवम उदासीन है एवम मात्र शरीर एवम प्रकृति की क्रियाओं का साक्षी है। अतः परमतत्व अद्वेत है। इसलिये उस का अनुभव और ज्ञान भी अज्ञात है। जब दूसरा कोई नही तो ज्ञान भी किसी को बताया नही जा सकता। इसलिये जो भी मार्ग योग के लिये उपलब्ध है वो उस तक पहुचने का मार्ग भर ही है। जब कोई दूसरा रहता ही नही तो ज्ञान का प्रसार या प्रचार हो ही नही सकता। इसलिये जो भी परमतत्व को नही जानता वो किसी न किसी रूप में अज्ञानी ही है। अतः हम कह सकते है अज्ञान शब्द ज्ञान की मात्रा का सूचक है, विषय संबंधित ज्ञान कम या अधिक हो सकता है किंतु बिल्कुल न हो यह संभव नही। इस के लिये मुमुक्षु हो कर मन और बुद्धि से भी परे अंतःकरण की शुद्धि की आवश्यकता है।
ज्ञान शब्दिक नही हो सकता, यह पढ़ कर, लिख कर, सुना कर या मनन कर के प्राप्त किया जा सकता है किंतु जब तक कर्ता या भोक्ता भाव है, यह परमात्मा के द्वारा प्रकृति के अज्ञान से ढका हुआ है। क्योंकि मन, बुद्धि भी प्रकृति ही है, वह कब, कैसे और कहाँ बदल जाये, कौन कह सकता है। प्रकृति को नियंत्रित कर के योग द्वारा ज्ञान तक पहुँचा जा सकता है, किन्तु विभिन्न जीव के ज्ञान को भी परमात्मा से अज्ञान से ढक दिया है, जिस से जीव इस सृष्टि का ही हिस्सा बना रहे। ज्ञान का उदय ह्रदय के अन्तकरण से होगा, जब तक मन एवम बुद्धि से ज्ञान को खोजेंगे, तो वह प्रवक्ता के भांति परमात्मा की विवेचना ही होगी। अंतःकरण जब तक शुद्ध-बुद्ध एवम आनन्दमय हो कर परमात्मा से नही मिलता, तब तक ज्ञान अज्ञान से ढका है।
ज्ञान और अज्ञान दोनो ही परमात्मा से मिलते है, किन्तु यह उस की व्यवस्था है जो प्रकृति माया द्वारा करती है, वह निमायक हो कर भी कुछ नही करता और यही उस के दिव्य कर्म भी है।
अष्टावक्र जी कहते है–
तुम आत्मस्वरूप संगरहित हो, निष्क्रिय ( जिसमें कोई क्रिया नहीं होती ) और स्वयंप्रकाश हो और समस्त दोषों से भी मुक्त हो । ऐसा जानते हुए भी जो समाधि में बैठना चाहता है या ऐसा करने का प्रयत्न कर रहा है – वही बन्धनों में उलझ रहा है । समाधि का प्रयास भी एक बन्धन है, क्योंकि इस प्रयास के अन्दर ही तुम्हारे अभिलाषाएं छिपी हुई हैं। जबतक कामना है, मोक्ष की प्राप्ति असंभव है ।। यही कामना ही अज्ञान है जो ज्ञान को ढक कर रखती है।
जब जीव स्वयं ब्रह्म का अंश है तो वह ज्ञानवान और प्रकाशवान तो है ही। उस के स्वरूप में प्रकृति के संयोग होने से कर्ता और भोक्ता भाव के अज्ञान का परदा आ जाता है। जैसे दर्पण पर धूल जम जाए तो देखने वाले को अपना स्वरूप नही दिखेगा किंतु यदि वह दर्पण साफ कर ले तो उसे अपना स्वरूप दिखेगा। यही अज्ञान दर्पण पर पड़े धूल के समान है, जिस ने ज्ञान और प्रकाश को धारण किए ब्रह्म के अंश जीव को भ्रमित कर रखा है।
परमतत्व का मार्ग हम पढ़ और सुन सकते है किंतु परमतत्व का ज्ञान बिना स्वयं को पहुचाये नही मिल सकता। गीता में अब गहन अध्ययन का पाठ शुरू हो गया है, जिसे ध्यान से पढ़ने एवम मनन द्वारा ही समझा जा सकता है।
।। हरि ॐ तत सत।। विशेष 5.15 ।।
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