।। Shrimadbhagwad Geeta ।। A Practical Approach ।।
।। श्रीमद्भगवत गीता ।। एक व्यवहारिक सोच ।।
।। Chapter 08.S II Summary II
।। अध्याय 08.S II सारांश II
॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥ अध्याय: ८ सारांश॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे अक्षर ब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः॥
|| ōṃ tatsaditi śrīmadbhagavadgītāsūpaniṣatsu brahmavidyāyāṃ yōgaśāstrē
śrīkṛṣṇārjunasaṃvādē akṣarabrahmayōgō nāma aṣṭamō’dhyāyaḥ ||
भावार्थ:
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद् भगवद् गीता के श्रीकृष्ण- अर्जुन संवाद में ‘अक्षरब्रह्म- योग’ नाम का आठवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ ॥
॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥
Summary of Bhagvad Gita Chapter 8:
In the seventh chapter, Shri Krishna gave a detailed description of Ishvara, and stressed the importance of recognizing the infinite aspect of Ishvara. The eight chapter took a bit of a detour from that topic. In the beginning of this chapter, Arjuna raised seven questions that Shri Krishna answered in this chapter. The key question was: “how does one attain Ishvara after death” which became the main topic of this chapter.
Shri Krishna began this topic by asserting that the thought of the time of death determines our fate. If that thought is of Ishvara, we will attain Ishvara. Since we will not know when our death occurs, he advised us to meditate upon our Ishvara throughout our life, so it automatically becomes our final thought. To help us cultivate this thought, Shri Krishna elaborated upon three types of meditation.
The first type of meditation was on the cosmic form of Ishvara and the second type was on the name of Ishvara, which is Om. Both these meditation techniques also required us to exercise control of our praana or life forces. Since this is beyond most of our capabilities, Shri Krishna recommended the third type of meditation which was much simpler. He advised us to remember Ishvara in any form but do so constantly throughout our life.
So then, what happens when we die? Shri Krishna said that the universe is like an infinite cycle of creation and dissolution, symbolically depicted as the day and night of Lord Brahma. Both day and night are each 4.32 billion years long. At the end of each day of Lord Brahma, all living and non-living beings become unmanifest. When the night of Lord Brahma ends, all those beings are manifest again. In other words, they are “frozen” at the end of the day and they “thaw” in the beginning of the day. This goes on infinitely.
Having known this, our state is pitiable. We are caught in this endless cycle of creation and dissolution. Only those beings who only put forth the effort come out of this endless cycle. They attain Ishvara transcends this cycle. So, urging us to take steps towards achieving liberation is the refrain of this chapter, and of the Gita as a whole.
Towards the end of the chapter, Shri Krishna enumerated the two paths that a jeeva or soul takes after death. The first path is the dark path which is attained by those who have performed good actions on this earth. They attain the abode of the moon (heaven). After exhausting the results of their actions, they return to this world and are reborn.
The second path is the bright path which is attained by those who have practised devoted meditation on Ishvara in addition to performing good actions. They attain the abode of Lord Brahma and remain there until its dissolution when they are eventually liberation. We are encouraged to take up this path.
।। हिंदी समीक्षा ।।
आठवां अध्याय – अक्षर ब्रह्म योग
सारांश
सत्य की खोज नही की जाती, वरन उस को प्राप्त करना होता है, यह अनुसंधान भी नही है कि विभिन्न सत्य मिलते जाए। परमात्मा की खोज नही की जाती, उस को प्राप्त किया जाता है। परब्रह्म सत्य है, उस मे विलीन होना ही जीव का लक्ष्य है। इस मे संशय या विचार का स्थान कम साधना एवम तप का स्थान ज्यादा है। गीता में प्रत्येक तत्व का विवेचन चर्चा का विषय या वाद-विवाद का विषय नही है, यह आत्मसात का विषय है, अतः यह श्रद्धा और विश्वास के साथ अनुग्रहण करने का मार्ग है। जो अनुसंधान या भौतिक ज्ञान का विकास गीता के पठन के माध्यम से करते है, वह जड़ प्रकृति में राजसी गुण का ही विकास करते है। दुर्योधन भी ज्ञानी ही था, वह सब जानते हुए भी, अपनी प्रवृति के सामने नतमस्तक था। क्योंकि उस ने ज्ञान को पढ़ा था, आत्मसात नही किया था। गीता के लगभग अर्धभाग तक पहुचने के बाद अब श्रद्धा और विश्वास का मार्ग ही ज्ञान और भक्ति है जो मोक्ष की ओर ले जाता है। क्या अब भी हम कोई संशय रखते है या अर्जुन के समान अपनी प्रवृति परमात्मा की ओर मोड़ देते है, यह अब हम पर निर्भर है।
सप्तम अघ्याय के अंत मे भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि अखिल कर्म, सम्पूर्ण अध्यात्म, अधिदेव, अधिभूत और अधियज्ञ को जो अंतकाल में भी मेरे ब्रह्मस्वरूप को जान लेता अर्थात यह समस्त ब्रह्म रूप मैँ ही हूँ, उसे ही योगयुक्त आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है, इसलिये अध्याय के आरंभ में अर्जुन द्वारा सात प्रश्न पूछे गए थे- यह ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, सम्पूर्ण कर्म क्या है, ये अधिदेव, अधिभूत और अधियज्ञ क्या है एवम अंतकाल में आप किस प्रकार जानने में आते है कि कभी विस्मृत नही होते।
योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि जिस का विनाश नही होता वही परब्रह्म है, स्वयं की उपलब्धि वाला परम् भाव अध्यात्म है, जिस से जीव माया के आधिपत्य से निकल कर आत्मा के आधिपत्य में हो जाता है वही अध्यात्म है। भूतों के वे भाव जो शुभ अथवा अशुभ संस्कारो को उत्पन्न करते है उन भावों का रुक जाना, विसर्ग या मिट जाना ही कर्म की संपूर्णता है। क्षर भाव ही अधिभूत है अर्थात नष्ट होने वाले ही भूतों को उत्पन्न करने में माध्यम है। भूतों के अधिष्ठाता ही अधिदेव है । इन मे परमपुरुष अधिदेव में ही हूँ। इस शरीर मे होने वाली समस्त क्रिया ही अधियज्ञ है अर्थात मैं ही यज्ञ का अधिष्ठाता हूं जिस में समस्त यज्ञ विलय होते है।
इस प्रकार् अंत काल मे शरीर को त्यागने वाले निष्काम स्थिर चित्त योगी में दो प्रकार अर्थात ज्ञानयोगी और ध्यान योग वर्गीकरण किया। अर्जुन को ज्ञानयोगी बन कर ह्रदय से भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करते हुए युद्ध करने को कहा। व्यवहार में यही ज्ञान योग का मार्ग है जो हमे हमेशा अपने इष्ट का स्मरण करते हुए, निष्काम कर्म को प्रेरित करता है, जिस से कभी भी कर्म करते है अहम भाव की मैं कर्ता हूँ, जाग्रत न हो। ध्यानयोगी स्मरण की उच्च स्थिति है, जो ब्रह्म के स्वरूप में विलीन होने और उस को अंत समय तक किस प्रकार प्राप्त करे। जिस से योगी क्रममुक्ति द्वारा विभिन्न लोक से होता हुआ, ब्रह्म को प्राप्त होता है।
अंतिम प्रश्न था कि अंत समय मे आप किस प्रकार जाने जाते है। भगवान ने बताया कि मृत्यु के समय जिस भी भाव से शरीर का त्याग किया जाता है उसे अगले जन्म में वो ही शरीर मिलता है। यह ‘ यथा मति तथा गति ‘ का सिंद्धान्तिक स्वरूप है। योगी पुरुष के लिए इस मे भगवान ने प्राण छोड़ते समय मन को ह्रदय में स्थित कर के आज्ञा चक्र ले जाते हुए ब्रह्मसिद्ध मार्ग से प्राण त्यागने की बात कही जो मुख्य तयः सांख्य योगी द्वारा संभव है। यह सांख्य योग पूर्व में ध्यान योग का ही एक भाग है। अन्य के लिये अनन्य स्मरण का मार्ग बताया है। भगवान ने घोषणा भी की है वो उन को स्मरण करने वालो के उपलब्ध है।
स्मरण के साथ निष्काम कर्मयोग की भी बात कही गयी है। स्मरण का अर्थ है योग धारणा में स्थिर रहते हुए भगवान के सिवा किसी भी अन्य का ध्यान नही रखना।
भगवान ने अक्षर ब्रह्म के बारे में बताया जिसे हम ॐ वाचक अक्षर से जानते है। निर्गुणकार योगी अपनी साधना द्वारा सीधे परम गति को प्राप्त होते है। किंतु सगुणाकार योगी के भगवान ने ब्रह्मलोक होते हुए प्राप्त होने का मार्ग बताया। सकाम योगी ब्रह्मलोक से वापस आता है निष्काम योगी ब्रह्मलोक के बाद परमगति को प्राप्त होता है। इस प्रकार ऊर्ध्व गति, क्रम मुक्ति से अपुनरावृति से जीव पुनः जन्म नहीं लेता। किन्तु जब कामना से साथ योग किया जाता है अर्थात जो लोग पुण्य कमा कर सुख भोगना चाहते है उन के लिये पुनरवर्तन का मार्ग बताया गया है।
निर्गुण की उपासना के लिये सगुणाकार उपासना प्रणव अक्षर के द्वारा किस प्रकार की जाए कि सगुणाकार उपासना निर्गुणकार ब्रह्म की उपासना में परिवर्तित हो जाये। इहलोक से ब्रह्मलोक का समय असीमित होने के बावजूद नित्य नही है। इस सम्पूर्ण सृष्टि का आधार वही निर्गुणाकार पूर्ण ब्रह्म है जिस में सम्पूर्ण सृष्टि समाई हुई है, किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण सृष्टि से परे अविनाशी और नित्य है।
मनुष्य के 4 करोड़ 32 लाख दिन के बराबर ब्रह्मा का एक दिन बताया एवम दिन में सम्पूर्ण प्रकृति एवम ब्रह्मांड का सृजन होता है एवम रात्रि में इस का प्रलय हो जाता है। परमात्मा का निवास इस ब्रह्मलोक के बाद है जिसे प्राप्त करने के बाद जीव पुनः जन्म नही लेता।
इस बाद मृत्यु के काल एवम मार्ग का विवरण दे कर शुक्ल पक्ष मार्ग अर्थात देवयान मार्ग एवम कृष्ण पक्ष अर्थात पितृयान मार्ग का ज्ञान दिया। शुक्ल पक्ष निर्मलता एवम प्रकाश का द्योतक है, विवेक, वैराग्य, शम, दम, तेज एवम प्रज्ञा इस के 6 माह है। कृष्ण पक्ष कालिमा का द्योतक है एवम काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवम मत्सर इस के 6 माह है। भगवान से कहा कि जो इन मार्ग को जानता है वो योगी वेद, यज्ञ, दान एवम तप आदि समस्त पुण्य कर्मों से ऊपर होता है।
यह शरीर अष्टधता प्रकृति से है, जिस में पंच महाभूत जड़ प्रकृति अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी मृत्यु उपरांत यही रह जाते है। सूक्ष्म शरीर मे मन और बुद्धि से जनित कामनाएं, आसक्ति और मोह कर्मफलों जनित बन्धन से एक नया अव्यक्त सूक्ष्म शरीर जीवात्मा धारण कर लेती है, जिस का मृत्यु के पहले शरीर के संबंधों से कोई सरोकार नही रहता। जीवात्मा परब्रह्म का स्वरूप होने से अकर्ता, नित्य और साक्षी है किंतु कामना, आसक्ति, मोह एवम कर्मफलों से बने सूक्ष्म शरीर है बन्धन में शुक्ल या कृष्ण पक्ष में अपने अपने कर्म फलों के अनुसार विभिन्न लोको में भ्रमण एवं अपने पुण्य फलों को भोग कर पुनः मृत्यु लोक आ जाती है। मन और बुद्धि नष्ट होने से पूर्व जन्म की कुछ भी बात याद नही रहती। अतः जड़ पदार्थ और लौकिक सम्बन्ध मात्र वर्तमान जन्म के शरीर के साथ ही रहते है। इन का राग-द्वेष ही सूक्ष्म शरीर का स्वरूप है। जो जीवात्मा मोह, कामना, आसक्ति और अहम से मुक्त होती है, वही कोई सूक्ष्म शरीर धारण नही करती और विभिन्न लोक में विचरण करते या सीधे परब्रह्म में विलीन हो जाती है। अर्जुन को जीव के वर्तमान और मृत्यु उपरांत का यह ज्ञान उस के मोह भंग करने के लिये दिया गया है कि जिसे वह सगे सम्बन्धी समझ कर कर्तव्य धर्म से बाहर होने की बात कर रहा है, वह जड़ प्रकृति के ही सम्बन्ध है। यह जड़ प्रकृति के छोड़ने या मृत्यु के बाद जीवात्मा कोई सम्बन्ध नही रखती।
ध्यान देने की बात है, यदि हम किसी की मृत्यु के उपरांत स्वप्न या विचार में उस व्यक्ति को देखते, सुनते या कार्य करते या आदेश देते महसूस करते है तो यह हमारे ही अवचेतन मन की सूक्ष्म धारणा या भ्रांति होती है। क्योंकि जड़ प्रकृति से बने शरीर मे अव्यक्त मन और बुद्धि के अवचेतन में अनेक ऐसी सूचनाएं और भावनाएं अंकित होती रहती है, जिन पर सदाहरणतयः हमारा योग के बिना कोई नियंत्रण नही होता।
गीता का आठवां अध्याय ज्ञान के दृष्टिकोण से महत्वपुर्ण है क्योंकि यह हमें हमारे जीवन का बोध कराता है कि हम जिस मार्ग पर चल रहे है वो सही है या गलत। सांसारिक मोह हमे अपनी उन जिम्मेदारियों में जकड़ अवश्य देता है जिस के रहते हमे इस संसार की एवम शरीर के लालन पालन की जरूरत अध्यात्म के ज्ञान से ज्यादा जरूरी लगती है। गीता ही एक मात्र ग्रंथ है जो कर्म पर अधिक ध्यान देता है इसलिये अपने मार्ग का निर्धारण, स्मरण द्वारा अनन्या भक्ति एवम निष्काम हो सांसारिक दायित्व का पालन करना हम सीखते है। काम करते वक्त यह हमारे मानसिक स्थिति को बताता है कि उस कार्य को हम निष्काम हो कर करे या कर्तृत्व भाव से। क्योंकि यदि हम जान बूझ कर वो ही दोहराते है तो यह संसार हमे बार बार आना पड़ेगा। गीता निठल्ले एवम आलसी लोगो के लिये नही है। यह घर बार को त्याग कर वन जाने वालों के लिये भी नही है। हमारी अपनी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा है कि कर्म करते हुए भी हम निष्काम हो कर सही मार्ग पर चले। गीता गलत रास्ते पर चलने वालो को कही भी डरा कर ज्ञान नही देती यह तो बस सही रास्ता बताती है जिस पर मुक्त होने की कामना रखने वालों को चलना है, नही तो पूर्णवर्तन का मार्ग तो सभी के लिये उपलब्ध है।
यदि हम ध्यान से गीता का अध्ययन कर रहे है तो अर्जुन युद्ध के लिए तत्पर था, किन्तु युद्ध भूमि में सगे संबंधियों को देख कर उसे अपनी अक्षमता एवम मोह का अहसास हुआ। इसलिये उस की भावनात्मक कमजोरी ने शारीरिक दुर्बलता का स्वरूप लिया और वह गलत निर्णय की ओर अग्रसर होते हुए, युद्ध त्याग कर वैराग्य की बाते करने लगा और तर्क द्वारा उसे सही सिद्ध करने लगा। एक अच्छे प्रवक्ता का गुण है कि श्रोता को समझ कर ज्ञान दे। इसलिये भगवान श्री कृष्ण ने प्रथम उस का उपहास कर के यह अहसास करवाया की जो वह सोच रहा है या बोल रहा है, वह गलत है। ज्ञानी व्यक्ति को ज्ञान को किस प्रकार और किन भावनात्मक स्थिति में रह कर ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। ज्ञान के विभिन्न मार्गों की चरम सीमा क्या है। ज्ञान को धारण करने वाले व्यक्ति विशेष में क्या गुण होने चाहिये। फिर ज्ञान में हमे किताबी बाते नही पढ़ते हुए, अंतिम अर्थ या लक्ष्य जानना चाहिये। सम्पूर्ण ज्ञान को जाने बिना हम अपनी भावनात्मक सीमाओं में उस का विश्लेषण करते है और अपने हिसाब से अर्थ निकालते है। ज्ञान को सम्पूर्ण गम्भीरता से योगी बन कर यदि समझे तो वह हमारी आसक्ति, कामना, मोह, राग-द्वेष से परे हमे क्या करना चाहिये, सही मार्ग दर्शन देगा। अतः इस अध्याय तक अर्जुन के मोह के निवारण तक निराकरण किया गया है जिस से अर्जुन मानसिक दुर्बलता एवम भावनात्मक कटिबद्धता से बाहर निकल कर ज्ञान को समझने के योग्य बने। हम सब अपने जीवन मे अर्जुन जैसे ही है, किन्तु गीता के सम्पूर्ण श्लोक के पाठ एवम कंठस्थ करने के बाद भी हम यदि अज्ञान में ही घूमते रहे, तो वास्तव में हम गीता पढ़ने के योग्य नही। इसलिये गीता बार बार पढ़ कर समझने योग्य ग्रन्थ है।
जब आप मंदिर में नई कीमती चप्पल पहन कर जाते है तो सब से पहले चप्पल को सुरक्षित स्थान पर खोलते है। मंदिर में प्रविष्ट कर के आप उस स्थान पर खड़े हो कर प्रार्थना करते है, जहां आप भगवान के दर्शन कर सके और चप्पल पर निगाह रख सके। फिर प्रार्थना करते है” त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।त्वमेव सर्व मम देवदेव।।” इस पर आप का आधा ध्यान चप्पल पर और आधा भगवान पर रहता है। अतः प्रार्थना किस के लिये मानी जाए। यही स्थिति गीता के अध्ययन में है, व्यापार, व्यवसाय, परिवार, समाज, धन, सुख, कामना, आसक्ति और अहम के साथ जब गीता का अध्ययन करते है, तो ध्यान किस पर है, यह महत्वपूर्ण है। गीता कर्तव्य धर्म का ज्ञान है, वह इन को त्यागने को नही कहती, वह बताती है कि हमे अपने कर्तव्य धर्म का पालन किस प्रकार करे। गीता अध्ययन की विशिष्टता को बतला रही है, जिस के कारण हम आगे परम् ज्ञान को प्राप्त करेंगे। यह क्रमबद्ध अर्जुन के शारीरिक, मानसिक एवम बौद्धिक विकास को परिपक्क कर रही है कि वह मोह को त्याग कर परमज्ञान को समझने लायक हो जाये। अब आगे परमज्ञान को भगवान श्री कृष्ण बतलाएगे। इस के लिये योगायुक्त होने को कहा गया है।
हमारा शरीर पंचभूतों से बना है किंतु इस के अंदर सुख, दुख का अहसास इंद्रियों और मन से होता है। फिर जो कुछ भी ज्ञानेद्रियां ग्रहण करती है, वह मन को बतलाती है और यह मन बुद्धि से उस के आनंद या दुख को महसूस करता है, अतः जो इस आनंद या कष्ट को भोगता है, वह मनोमय कोश होता है। संसार के दुख और सुख को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि यह शरीर यदि कर्म द्वारा मुक्ति का साधन है तो भोक्ता भी है। इसलिए प्रकृति का आनंद लेना एक बात है और उस आनंद के साथ कामना और आसक्ति रखना दूसरी बात। प्रकृति के आनंद को जो नहीं भोग कर अपना संबंध जी जीव परमात्मा से जोड़ता है, तो यही मनोमय कोश, आनंदमय कोश हो जाता है। इसलिए जीव को अपने स्वरूप को मनोमय और आनंदमय दोनों ही स्वरूप को स्वीकार करते हुए, कर्तव्य कर्म करना चाहिए।
वस्तुतः योग की यह स्थिति देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि का ब्रह्म के साथ योग है, जिस में जीव का अज्ञान की वह कर्ता है और प्रकृति के साथ उस का सम्बन्ध है, नष्ट हो जाता है। फिर उस के समस्त कर्म सृष्टि यज्ञ संचालन के कर्म हो जाते है और वह मात्र निमित हो कर अपने कर्तव्य कर्म का पालन करता है। इसलिये भगवान अर्जुन को योगयुक्त योगी होने को कहते है। वेदाध्ययन, यज्ञ, तप एवम दान में जो पुण्य फल कहा गया है, यह योगी तो सर्व कर्ता बुद्धि से छूटकर सर्वात्म हुआ सर्व के आदि स्थान को प्राप्त कर जाता है और इन सर्वफलों को पार कर जाता है।
।।हरि ॐ तत सत ।। अध्याय अष्टम सारांश ।।
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