।। Shrimadbhagwad Geeta ।। A Practical Approach ।।
।। श्रीमद्भगवत गीता ।। एक व्यवहारिक सोच ।।
।। Chapter 08.28 II
।। अध्याय 08.28 II
॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥ 8.28॥
वेदेषु यज्ञेषु तपः सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
“vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva,
dāneṣu yat puṇya-phalaḿ pradiṣṭam..।
atyeti tat sarvam idaḿ viditvā,
yogī paraḿ sthānam upaiti cādyam”..।।
भावार्थ:
योग में स्थित मनुष्य वेदों के अध्यन से, यज्ञ से, तप से और दान से प्राप्त सभी पुण्य-फलों को भोगता हुआ अन्त में निश्चित रूप से तत्व से जानकर मेरे परम-धाम को ही प्राप्त करता है, जो कि मेरा मूल निवास स्थान है। (२८)
Meaning:
Whatever auspicious results have been indicated in the Vedas, rituals, austerities and also in charity, the yogi transcends all these having known this (knowledge) and attains the primal supreme state.
Explanation:
Shri Krishna concludes the eighth chapter with this shloka. He tells us that he has spelled out an entire “flowchart for the afterlife”. With this knowledge, we have the means to achieve anything including heaven, rebirth, and liberation. The outcome solely depends upon our behaviour while we are alive.
Traditionally, seekers used the instructions in the Vedas to perform rituals, austerities, and charity. Many of them did so with the goal of attaining a better state in the afterlife. In our case, even though we may not perform rituals per se, our goal is similar. We try to do good actions and charity so that we can earn “punya” or merit for the afterlife. However, we know know that mere performance of good actions will get us to heaven, but we will eventually come back once our merits are exhausted.
The Ramayan states:
“You may engage in good conduct, righteousness, austerities, sacrifices, ashtanga yoga, chanting of mantras, and charity. But without devotion to God, the mind’s disease of material consciousness will not cease.”
Therefore, Shri Krishna recommends the bright path of devotion and action that leads us to the abode of Lord Brahma, and eventually into liberation. This path of graduated liberation, indicated by the phrase “supreme primal state” is also known as “krama mukti”. One who achieves this path transcends, or goes beyond the results of heaven, because he attains liberation which frees him from finitude.
All these good deeds can only reap material rewards, which are temporary. However, devotion to God leads to liberation from the bondage of the material world. Therefore, the yogis who have realized this truth detach their mind from the material world and attach it to God alone. Treading on this path of light, they eventually attain eternal happiness.
Shri Krishna is not done yet. There is yet another path of liberation that is his personal favourite. We shall learn more in the coming chapters.
।। हिंदी समीक्षा ।।
तत्वयोगी एवम निष्काम कर्मयोगी जिस ने देवयान मार्ग (शुक्ल मार्ग) एवम पितृयान मार्ग (धूम्र मार्ग-कृष्ण मार्ग) का ज्ञान प्राप्त कर लिया है। जिस ने अपने स्वरूप को जान लिया है, वह यह समझ लेता है कि भोग भूमियों की भी आखिरी हद जो ब्रह्मलोक है वहाँ जाने पर भी लौट कर पीछे आना पड़ता है परन्तु भगवान् को प्राप्त होने पर लौट कर नहीं आना पड़ता और साथ साथ यह भी समझ लेता है कि मैं तो साक्षात् परमात्मा का अंश हूँ तथा ये प्राकृत पदार्थ नित्यनिरन्तर अभाव में नाश में जा रहे हैं तो फिर वह नाशवान् पदार्थों में भोगों में न फँसकर भगवान् के ही आश्रित हो जाता है। वह परम आदि स्थान अर्थात पूर्ण ब्रह्म में स्थित हो जाता है।
अध्याय ने अध्याय के आरंभ में सात प्रश्न किए थे, जिस में सातवां प्रश्न था कि प्रयाण काल में आत्म संयमी अर्थात योगयुक्त जन द्वारा आप को किस प्रकार जाना जा सकता है? पूर्व श्लोक के विवेचन में हम ने यह समझा की जीव क्या है, उस की गति और लक्ष्य क्या होना चाहिए। इस श्लोक में अर्जुन के प्रश्न और जीव को क्या और कैसे रहना चाहिए का उत्तर दिया गया है।
यज्ञ दान तप तीर्थ व्रत आदि जितने भी शास्त्रीय उत्तम से उत्तम कार्य हैं और उन का जो फल है वह विनाशी ही होता है। कारण कि जब उत्तम से उत्तम कार्य का भी आरम्भ और समाप्ति होती है तो फिर उस कार्य से उत्पन्न होने वाला फल अविनाशी कैसे हो सकता है वह फल चाहे इस लोक का हो चाहे स्वर्गादि भोग भूमियों का हो उस की नश्वरता में किञ्चिन्मात्र भी फरक नहीं है।ऐसे तत्वविद ज्ञानी पुरुष को वेदाध्ययन, यज्ञ, दान एवम तप द्वारा किसी भी पुण्य की प्राप्ति की आवश्यकता नही रहती। अपने स्वरूप को प्राप्त होने के बाद एवम जब अविदित तत्व ही विदित हो गया तो अब किस को प्राप्त करना या जानना शेष रह जाता है।
हमे यह ध्यान रखना चाहिए कि साधन एवम साध्य में क्या अंतर है। साध्य के लिये साधन की आवश्यकता रहती है किंतु साध्य प्राप्त होने के साधन आवश्यक नहीं। किसी स्थान पर जाने के कार का उपयोग करते है एवम उस स्थान पर पहुच कर कार को छोड़ देते है। बिना कार के आप गंतव्य स्थान को प्राप्त करने में विलंब करेंगे, इसलिये कार जरूरी है। परमतत्व को प्राप्त करने के यह तप, वेद, यज्ञ एवम कर्म जरूरी है किंतु परमतत्व प्राप्त होने के बाद इन का अतिक्रमण कर लिया जाता है।
सगुणाकार परमात्मा की भक्ति को साधन समझ कर निर्गुणकार परब्रह्म की आराधना ही साध्य है। अर्जुन के सात प्रश्नों के उत्तर को समझना और उस के अनुसार सगुणाकार की आराधना, पूजा, तप, दान पुण्य करते हुए, निर्गुणकार को प्राप्त करने का मार्ग सकाम से निष्काम भक्ति है। जो मनुष्य इस रहस्य को समझ जाता है, उस के कर्म फल क्षीण हो जाते है और वह यथा शीघ्र परमपद अर्थात मोक्ष को प्राप्त होता है।
परम तत्व को जानना, उस का ज्ञान प्राप्त करना, उस को सुन लेना या पढ़ लेना यह सब कर्म सरल है और हम सब इस को कर भी रहे है किंतु इस को आत्मसात करना एवम इस का बोध होना कठिन। इस के लिये निरंतर ध्यानाभ्यास होना चाहिए। ध्यानाभ्यास द्वारा व्यक्तित्व का संगठन उपर्युक्त यज्ञादि साधनों की अपेक्षा लक्षगुना अधिक सरलता एवं शीघ्रता से हो सकता है किन्तु यहाँ यह भी मानकर चलते हैं कि ध्यान के साधक में आवश्यक मात्रा में विवेक और वैराग्य दोनों ही हैं। सतत नियमपूर्वक ध्यान करने से इनका भी विकास हो सकता है। इस प्रकार जब योगी ध्यान साधना से निष्काम कर्म एवं उपासना का फल प्राप्त करता है और ध्यान की निरन्तरता बनाये रखता है तो वह सफलता के उच्चतर शिखर की ओर अग्रसर होता हुआ अन्त में इस आद्य अक्षर पुरुष स्वरूप मेरे परम धाम को प्राप्त होकर पुनः संसार को नहीं लौटता।
व्यवहार में हम सब इस संसार में यात्री है, यह संसार अर्थात प्रकृति अपने आप में अत्यंत सुंदर है। इस के क्षणिक और भौतिक सुख के आनंद से कोई इंकार नहीं कर सकता, परंतु उस के प्रति कामना और आसक्ति दुख का कारण भी हो सकती है और मुक्ति में बाधा भी। एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के जिस भी साधन का उपयोग हम करते है तो लक्ष्य साधने के लिए। यात्रा में असुविधा न हो, इसलिए सही साधन को लेते है। शेष यात्रा की मानसिकता में शांति और प्रफुल्लता हो तो यात्रा आनंद से भरपूर होगी। रास्ते अच्छे और बुरे सभी मिलते है। अतः शरीर साधन है तो उसे स्वस्थ तन और मन से रखना होगा। बुद्धि से यात्रा को अधिक उपयोगी बना सकते है। लोकसंग्रह के कार्य करते हुए यदि आगे बढ़े तो यात्रा के साधन अर्थात शरीर और रास्ते के पड़ाव से मोह नहीं होगा। अतः दान – धर्म, तप, त्याग, निष्काम कर्म से यात्रा को करते हुए आनंद से पूर्ण करे और पूरी यात्रा में अपने लक्ष्य को ध्यान अर्थात मोक्ष के लिए परमात्मा के प्रति भक्ति भाव से समर्पित रहे। यही जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य हो। फिर अपने वर्ण अर्थात स्वभाव और प्रारब्ध से जो भी कर्म मिले उसे प्रकृति द्वारा निमित्त मानकर कर्तव्य धर्म के अनुसार कार्य निष्काम और निर्लिप्त भाव से करे। सत गुण में आलस्य को कोई स्थान नहीं। निष्काम और निर्लिप्त होने का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने कर्तव्य कर्म को अर्थहीन समझे। उस के लिए मेहनत, लगन, समर्पण और अभ्यास द्वारा श्रेष्ठ रहना ही हमारा कर्तव्य है। यही संयम, योग युक्त योगी ही पहचान है।
आठवें अध्याय के अंतिम श्लोक के बाद हम कल राजविद्या राजगुह्य योग नाम से नवमोSध्याय को पढेंगे।
।। हरि ॐ तत सत।।8.28।।
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